‘पापा! एग्जाम के बाद आना…’, साकेत हादसे में आखिरी वादा रह गया अधूरा, मलबे के पास पथराई आंखों से बैठा रहा बेबस पिता, जमीन बेचकर पढ़ाया था बेटी को
‘पापा! एग्जाम के बाद आना…’, साकेत हादसे में आखिरी वादा रह गया अधूरा, मलबे के पास पथराई आंखों से बैठा रहा बेबस पिता, जमीन बेचकर पढ़ाया था बेटी को


शनिवार का दिन… शाम के ठीक 7:30 बजे थे. राजस्थान के अलवर के पास स्थित एक छोटे से गांव में रहने वाले रमेश जी का हाथ बार-बार अपने मोबाइल की स्क्रीन पर जा रहा था. हर रोज इसी वक्त उनके फोन की घंटी बजती थी और दूसरी तरफ से एक चहकती हुई आवाज आती थी, “पापा-मम्मी, कैसे हैं आप?” लेकिन उस दिन 7:30 बजे फोन नहीं आया. समय बीतता गया, रात गहरी होती गई और पिता का दिल किसी अनहोनी की आशंका से बैठने लगा. यह वह फोन कॉल था, जो कभी मिस नहीं होता था. दिल्ली के साकेत में हुए दर्दनाक इमारत हादसे ने न सिर्फ एक बिल्डिंग को मलबे में तब्दील किया, बल्कि दो होनहार युवाओं के सपनों को भी हमेशा के लिए दफन कर दिया.
22 साल की एकता इसी महीने 25 जून को अपना 23वां जन्मदिन मनाने वाली थी. वह अपने गांव की पहली ऐसी बेटी थी, जो डॉक्टर बनने का सपना लेकर विदेश (किर्गिस्तान) पढ़ाई करने गई थी. अपनी मेडिकल की डिग्री पूरी करने के बाद, वह पिछले डेढ़ साल से दिल्ली में रहकर फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट्स एग्जामिनेशन (FMGE) की तैयारी कर रही थी. 28 जून को उसकी परीक्षा थी और उसे पूरा भरोसा था कि वह इसे पास कर लेगी. वह बच्चों की डॉक्टर (पीडियाट्रिशियन) बनना चाहती थी, क्योंकि उसे बच्चों से बेपनाह लगाव था.
“पापा, एग्जाम के बाद आना, साथ घर चलेंगे…”
हादसे वाले दिन शनिवार दोपहर करीब 4:30 बजे एकता ने अपने पिता से बात की थी. वह बेहद खुश थी क्योंकि उसने कोचिंग के एक मॉक टेस्ट में बहुत अच्छा स्कोर किया था. उसने पिता से कहा था- पापा, 28 जून को मेरा एग्जाम है. आप परीक्षा के बाद दिल्ली आना, फिर हम सब मिलकर मेरा जन्मदिन मनाएंगे और साथ में गांव चलेंगे. पिता अपनी बेटी के इस वादे के पूरा होने का इंतजार ही कर रहे थे कि रविवार दोपहर 3:55 बजे मलबे से एकता की बेजान लाश बाहर निकाली गई. लगभग 20 घंटे तक चले रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान पिता रमेश वहीं मलबे के पास पथराई आंखों से बैठे रहे- इस उम्मीद में कि शायद कोई चमत्कार हो जाए, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था.
परिवार के अनुसार, एकता बचपन से ही मेधावी थीं और डॉक्टर बनने का सपना देखती थीं. आर्थिक तंगी के बावजूद माता-पिता ने उनकी पढ़ाई में कभी बाधा नहीं आने दी. एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए एकता को किर्गिस्तान भेजा गया. इसके लिए परिवार ने कर्ज लिया और अपनी जमीन भी बेच दी. वर्षों के संघर्ष और त्याग के बाद एकता डॉक्टर बनकर भारत लौटीं. परिवार को विश्वास था कि अब उनके अच्छे दिन शुरू होंगे. लेकिन आगे बढ़ने की चाह में वह दिल्ली आकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने लगीं. सैद-उल-अजैब हादसे ने न सिर्फ उनकी जिंदगी छीन ली, बल्कि उस परिवार की वर्षों की मेहनत, उम्मीद और त्याग को भी मलबे में दबा दिया, जिसने बेटी के सपनों के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया था.
साकेत बिल्डिंग हादसे में अब तक क्या कार्रवाई हुई?
साकेत मेट्रो स्टेशन के पास सैद-उल-अजैब स्थित गली नंबर-5, वेस्टर्न मार्ग में इमारत गिरने की घटना के मामले में MCD ने दो अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की है. दक्षिण जोन के डिप्टी कमिश्नर ने जूनियर इंजीनियर (बिल्डिंग विभाग-II) अमन जैन को कर्तव्यों के प्रति लापरवाही और ढिलाई बरतने के आरोप में निलंबित कर दिया है. इसके अलावा असिस्टेंट इंजीनियर (बिल्डिंग विभाग-II) सुदेश सिंह चौहान को प्रभावी निगरानी नहीं करने और अपने दायित्वों में लापरवाही बरतने के आरोप में सस्पेंड किया गया है.
यह कार्रवाई सैद-उल-अजैब में इमारत ढहने की घटना की प्रारंभिक जांच के बाद की गई है. MCD ने स्पष्ट किया है कि हादसे के लिए जिम्मेदार पाए जाने वाले अधिकारियों और संबंधित लोगों के खिलाफ आगे भी आवश्यक कार्रवाई की जाएगी.
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