न जंग की जीत, न शांति की गारंटी... अमेरिका-ईरान में ऐसे होगी पीस डील

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न जंग की जीत, न शांति की गारंटी... अमेरिका-ईरान में ऐसे होगी पीस डील

04 जून 2026 को 09:51 am बजे
न जंग की जीत, न शांति की गारंटी... अमेरिका-ईरान में ऐसे होगी पीस डील

तीन महीने से पश्चिम एशिया को झकझोर रही जंग अब शायद ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है, जहां सभी पक्ष लड़ाई से ज्यादा राहत की तलाश में दिख रहे हैं. अमेरिका और इजरायल का मकसद ईरान को पूरी तरह कमजोर करना था, लेकिन अब जो तस्वीर उभर रही है, उसमें न तो ईरान पूरी तरह टूटा है और न ही अमेरिका अपनी सभी शर्तें मनवा पाया है.

अब बताया जा रहा है कि दोनों पक्षों के बीच एक अंतरिम समझौते पर बातचीत चल रही है. इस डील का सबसे बड़ा मकसद होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोलना है, जो दुनिया के तेल व्यापार की सबसे महत्वपूर्ण समुद्री लाइनों में से एक माना जाता है. इसके साथ ही ईरान को कुछ आर्थिक राहत देने, उसके फ्रिज अरबों डॉलर के फंड जारी करने और सीमित स्तर पर प्रतिबंधों में ढील देने पर भी चर्चा हो रही है.

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युद्ध और प्रतिबंधों ने ईरान की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है. महंगाई बढ़ी है, विदेशी मुद्रा की कमी है और आम लोगों की परेशानियां बढ़ रही हैं. ऐसे में तेहरान चाहता है कि उसे कुछ आर्थिक राहत मिले, लेकिन वह अपने परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल क्षमताओं पर बड़ा समझौता करने को तैयार नहीं है.

दूसरी तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी राजनीतिक दबाव में हैं. नवंबर में होने वाले मिड-टर्म चुनावों से पहले वह कोई ऐसी उपलब्धि दिखाना चाहते हैं जिसे ईरान पर बड़ी जीत के रूप में पेश किया जा सके. खासकर परमाणु कार्यक्रम और उच्च स्तर के यूरेनियम भंडार को लेकर वह एक ठोस संदेश देना चाहते हैं.

हालांकि समस्या यह है कि दोनों पक्षों की मूल मांगों में अब भी बड़ा अंतर है. ईरान यूरेनियम संवर्धन छोड़ने को तैयार नहीं है. अमेरिका सुरक्षा गारंटी देने के पक्ष में नहीं है. वहीं इजरायल अब भी ईरान को अपने लिए सबसे बड़ा खतरा मानता है और उसके प्रभाव को सीमित करना चाहता है.

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह समझौता हो भी जाता है, तो यह स्थायी समाधान नहीं होगा. अधिक संभावना इस बात की है कि मुश्किल और विवादित मुद्दों को भविष्य के लिए टाल दिया जाएगा. यानी अभी सिर्फ तनाव कम करने और युद्ध रोकने पर फोकस रहेगा.

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बातचीत में एक और अहम मुद्दा लेबनान का भी है. ईरान चाहता है कि किसी भी समझौते में इजरायल द्वारा हिजबुल्लाह के खिलाफ हमले रोकना भी शामिल हो. इसी वजह से ट्रंप प्रशासन ने हाल के दिनों में इजरायल पर बेरूत और दक्षिणी लेबनान में हमले सीमित करने का दबाव डाला है.

विश्लेषकों का कहना है कि अगर समझौता हुआ तो हो सकता है होर्मुज स्ट्रेट फिर से खुल जाए और वैश्विक बाजारों को राहत मिले. लेकिन ईरान की मिसाइल ताकत, परमाणु महत्वाकांक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव जैसे मूल विवाद जस के तस बने रहेंगे.

यही वजह है कि कई विशेषज्ञ इस संभावित डील को शांति समझौता नहीं, बल्कि "जंग में एक विराम" मान रहे हैं. लड़ाई भले कुछ समय के लिए रुक जाए, लेकिन ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच अविश्वास और टकराव की असली कहानी अभी खत्म होती नहीं दिख रही.

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