मीनाक्षी नटराजन के पास क्या विकल्प? जानें एक्सपर्ट की राय

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मीनाक्षी नटराजन के पास क्या विकल्प? जानें एक्सपर्ट की राय

10 जून 2026 को 07:23 pm बजे
मीनाक्षी नटराजन के पास क्या विकल्प? जानें एक्सपर्ट की राय

मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन के नामांकन पत्र (फॉर्म 26) में आपराधिक मामले की जानकारी छुपाने का विवाद अब गहरा गया है. चुनावी और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञों के मुताबिक, इस मामले में रिटर्निंग ऑफिसर (RO) का निर्णय ही अंतिम और सर्वोपरि होगा. यदि उनका नामांकन रद्द होता है या चुनाव के बाद इसे चुनौती दी जाती है, तो मीनाक्षी नटराजन के पास अब केवल अदालत का दरवाजा खटखटाने का ही कानूनी विकल्प बचता है, वह भी चुनाव प्रक्रिया पूरी होने के बाद.

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और चुनावी प्रक्रियाओं के जानकार आर. के. सिंह के अनुसार यह पूरा मामला आपराधिक प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है. संबंधित मजिस्ट्रेट ने एक शिकायत पर संज्ञान लेते हुए 17 सितंबर 2025 को मीनाक्षी नटराजन को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 223 के तहत नोटिस जारी किया था. इसके जवाब में 24 अक्टूबर को मीनाक्षी के वकील कोर्ट में हाजिर भी हुए थे. कानूनन इसका सीधा मतलब यह है कि उन्होंने आपराधिक अदालती प्रक्रिया में हिस्सा ले लिया था और यह मामला कोर्ट में लंबित श्रेणी में आ चुका था.

उनका कहना है कि नामांकन के समय भरे जाने वाले फॉर्म 26 के नियम बेहद सख्त हैं. इसमें प्रत्याशी को न केवल अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर (FIR) बल्कि कोर्ट में लंबित सभी मुकदमों, समन, नोटिस और जवाबी हलफनामों का पूरा ब्यौरा देना अनिवार्य होता है. मीनाक्षी नटराजन के मामले में नोटिस और जवाब दोनों दाखिल हो चुके थे, जिसे छुपाना चुनाव नियमों और हैंडबुक का स्पष्ट उल्लंघन है.

आर. के. सिंह के मुताबिक, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत नामांकन के स्क्रूटनी चरण में रिटर्निंग ऑफिसर का फैसला ही अंतिम होता है. यदि रिटर्निंग ऑफिसर फॉर्म 26 में विसंगति या जानकारी छुपाने के आधार पर कोई कार्रवाई करता है, तो इस चरण में केंद्रीय चुनाव आयोग भी हस्तक्षेप नहीं कर सकता.

अगर मीनाक्षी नटराजन को इस फैसले के खिलाफ अपील करनी है, तो उन्हें चुनाव संपन्न होने का इंतजार करना होगा. इसके बाद ही वह हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में चुनाव याचिका दाखिल कर सकती हैं.

हालांकि, अदालत का रास्ता भी मीनाक्षी के लिए आसान नहीं रहने वाला है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई पुराने फैसलों में साफ किया है कि चुनाव याचिकाओं का निपटारा सभी पक्षों को सनवाई का पूरा मौका देने के बाद ही किया जाता है, इसमें कोई हड़बड़ी नहीं की जा सकती. कानूनी रिकॉर्ड गवाह हैं कि कई बार इन याचिकाओं पर अंतिम फैसला आने में 8 से 10 साल तक का समय लग जाता है. तब तक संबंधित सांसद या विधायक का कार्यकाल भी समाप्त हो चुका होता है.

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