डॉक्टर कैसे करते हैं खुद को हील, जानें उनके अनुभव

स्वास्थ्य

डॉक्टर कैसे करते हैं खुद को हील, जानें उनके अनुभव

01 जुलाई 2026 को 07:08 am बजे
डॉक्टर कैसे करते हैं खुद को हील, जानें उनके अनुभव

1 जुलाई को National doctors day 2026 मनाया जाता है. इस बार डॉक्टर्स डे की थीम है Behind the Mask: Who Heals the Healers? इस साल की थीम उन डॉक्टरों की मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक सेहत का ध्यान रखने के महत्व पर जोर देती है. डॉक्टर मरीजों की देखभाल के लिए अपनी जिंदगी समर्पित कर देते हैं. लेकिन वह भी तो आम इंसान की तरह मानसिक तनाव और शारीरिक समस्याओं का शिकार होते हैं, इस स्थिति में उनकी देखभाल कौन करता है? कैसे वह खुद को लगातार काम के लिए प्रेरित रखते हैं? यह डॉक्टर्स खुद ही बता रहे हैं.

डॉ. दिनेश गोरा, राजस्थान के सवाई मानसिंह अस्पताल में ट्रॉमा सर्जन और पॉलीट्रॉमा केयर के प्रभारी हैं. वह बताते हैं कि कई सालों से ट्रॉमा सेंटर में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. फिलहाल एसएमएस हॉस्पिटल में हैं. इससे पहले दिल्ली एम्स के ट्रॉमा सेंटर में सर्जन थे. इस दौरान उन्होंने अधिकतर ऐसे मरीजों का ही इलाज किया जो बहुत गंभीर हालत में अस्पताल आए थे.

डॉ दिनेश कहते हैं कि एक ट्रॉमा सर्जन केवल मरीज की सर्जरी ही नहीं करता बल्कि हर दिन मरीज की जिंदगी को बचाने की कोशिश करता है. कभी किसी सड़क दुर्घटना में घायल को बचाने की जद्दोजहद,तो कभी किसी बच्चे की नाजुक सांसों को थामे रखने का संघर्ष. इस दौरान अगर मरीज की जान नहीं बच पाती तो खुद भी अंदर से परेशान हो जाते है. लेकिन फिर दूसरे मरीज के लिए अपनी ड्यूटी निभानी होती है. इस सबके बीच अपनी मेंटल और फिजिकल हेल्थ का भी ध्यान रखना होता है.

डॉ दिनेश बताते हैं कि जब दुर्घटना में घायल किसी गंभीर मरीज की जान बचा ली जाती है तो दिल को बहुत खुशी होती है. उस व्यक्ति के परिवार के लोग आकर गले मिलते हैं और उनको आंखों में आंसू भी होते हैं. उस समय लगता है कि एक व्यक्ति की जिंदगी बचाकर पूरे परिवार को खुशी दी है. यही एहसास हील करता है और लगातार अपना काम करने के लिए प्रेरित करता है. गंभीर मरीजों की जान बचाकर जो खुशी मिलती है उसको बयां नहीं किया जा सकता. भले ही काम के घंटे कितने भी हो, थकान हो या कोई मानसिक तनाव ट्रॉमा सेंटर में आए मरीज की जान बचाने का यह एहसास सभी तकलीफों को दूर कर देता है. .

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दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में कम्यूनिटी मेडिसिन विभाग में डायरेक्टर प्रोफेसर डॉ किशोर ने डॉक्टर्स डे पर अपने अनुभव साझा किए हैं. डॉ किशोर कम्यूनिटी में फैली हुई बीमारियों के मरीजों का इलाज करते हैं. वह टीबी से लेकर एचआईवी के मरीजों की जिंदगी को नई दिशा देते हैं.

डॉ किशोर कहते हैं कि यह दोनों बीमारियों अब घातक तो नहीं है, लेकिन मरीजों को मानसिक रूप से बहुत परेशान करती हैं.  समाज ऐसा है कि इन बीमारियों के मरीजों को अलग निगाह से देखता है. ऐसे में जब ये मरीज आकर उनके साथ हुए व्यवहार के बारे में बताते हैं तो बहुत दुख भी होता है. सोचते हैं कि उनको ये बीमारी क्यों हो गई, लेकिन फिर पहले उनका हौसला बढ़ाते हैं और बाद में खुद का. इस दौरान कभी- कभी मानसिक तनाव भी होता है, लेकिन कई चीजें ऐसी हैं जो हील कर देती हैं.

डॉ किशोर कहते हैं कि जब कोई मरीज आकर कहता है कि डॉक्टर साहब आपके इलाज से मैं बिलकुल ठीक हो गया, तो यही एहसास हील कर देता है. मरीज का ठीक होना ही डॉक्टर के लिए सबसे बड़ी खुशी है. डॉक्टर को अगर कोई परेशानी है भी तो मरीज की ये बात सब दुख दूर कर देती है.

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दिल्ली के राजीव गांधी हॉस्पिटल में एसोसिट प्रोफेसर डॉ अजीत कुमार हार्ट के मरीजों की सर्जरी करते हैं. उनके पास हर दिन ऐसे मरीज आते हैं जिनको हार्ट अटैक आ चुका होता है और वह जिंदगी के लिए संघर्ष कर रहे होते हैं. इन मरीजों की सर्जरी कर डॉ कुमार उनको नया जीवन देते हैं.

वह कहते हैं कि मरीज की सर्जरी करके जान बचा लेते हैं तो यही सुख का असली एहसास देता है और रोज अपने काम को करने के लिए प्रेरित करता है, लेकिन बीते कुछ सालों में डॉक्टरों के खिलाफ हिंसा की घटनाएं बढ़ गई हैं. यह सब कई बार बहुत डरावना भी लगता है. इसलिए डॉक्टर्स डे पर यह कहना चाहता हूं कि लोग चिकित्सकों का सम्मान करें, उनके साथ संवेदना रखें और सहयोग करें.

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