ईरान का ब्रह्मास्त्र! रूस और चीन के दम पर ट्रंप के डिफेंस सिस्टम की उड़ा रहा धज्जियां
ईरान का ब्रह्मास्त्र! रूस और चीन के दम पर ट्रंप के डिफेंस सिस्टम की उड़ा रहा धज्जियां

ईरान अपनी मिसाइल तकनीक को इतना मजबूत कर चुका है कि अमेरिकी और इजरायली मिसाइल डिफेंस सिस्टम को भी उसे रोकना मुश्किल हो रहा है. अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि ईरानी मिसाइलें अब तेज गति से उड़ती हैं. बीच में रास्ते में मुड़ जाती हैं. बेहतर निशाना लगाती हैं. इससे पहले ये मिसाइलें आसानी से रोकी जा सकती थीं, लेकिन अब स्थिति बदल गई है.
कई विशेषज्ञों को शक है कि चीन या रूस ईरान को टारगेटिंग टेक्नोलॉजी और अन्य मदद दे रहे हैं, जिससे ईरान की मिसाइलें ज्यादा घातक बन गई हैं. यह डेवलपमेंट मिडिल ईस्ट में तनाव को और बढ़ा रहा है. अमेरिका-इजरायल की डिफेंस सिस्टम को नई चुनौती दे रहा है.
ईरान ने फतह-1 और फतह-2 जैसी हाइपरसोनिक मिसाइलें विकसित की हैं, जो साउंड की स्पीड से पांच गुना तेज उड़ सकती हैं. ये मिसाइलें उड़ते समय दिशा बदल सकती हैं, जिससे उन्हें ट्रैक करना और रोकना बहुत मुश्किल हो जाता है. पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइलों के मुकाबले ये ज्यादा मैन्यूवर करती हैं.
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ईरान का दावा है कि ये मिसाइलें अमेरिका और इजरायल की सबसे एडवांस डिफेंस सिस्टम जैसे आयरन डोम, एरो और THAAD को भी चकमा दे सकती हैं. हाल के हमलों में इन मिसाइलों ने कई इंटरसेप्टर को पार करके टारगेट हिट किया. इससे पहले इजरायल और अमेरिका की डिफेंस सिस्टम कामयाब रहती थीं, लेकिन अब ईरान की नई तकनीक ने बैलेंस बदल दिया है.
ये मिसाइलें ठोस ईंधन वाली हैं. उनका वॉरहेड अलग से प्रोपेल्ड होता है, जो टर्मिनल फेज में मैन्यूवर कर सकता है. इससे रडार और इंटरसेप्टर के लिए मुश्किल बढ़ जाती है. ईरान ने इन्हें इजरायल पर हमलों में इस्तेमाल किया और दावा किया कि कई मिसाइलें सफल रही.
अमेरिकी और इजरायली अधिकारी चिंतित हैं क्योंकि उनकी डिफेंस सिस्टम की क्षमता सीमित हो रही है. हाइपरसोनिक हथियारों की स्पीड और मैन्यूवरेबिलिटी मौजूदा टेक्नोलॉजी को पुराना बना रही है.
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रूस ईरान को सैटेलाइट इमेजरी और बेहतर ड्रोन टेक्नोलॉजी दे रहा है, जो ईरान को अमेरिकी बलों को बेहतर तरीके से टारगेट करने में मदद कर रही है. वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक, मॉस्को ने इंटेलिजेंस शेयरिंग बढ़ा दी है ताकि तेहरान अमेरिका और इजरायल के खिलाफ लड़ाई जारी रख सके.
रूस को इस युद्ध से फायदा हो रहा है क्योंकि ईरान रूस को ड्रोन सप्लाई करता है, जिसका इस्तेमाल यूक्रेन युद्ध में हो रहा है. बदले में रूस ईरान को टेक्नोलॉजी और इमेजरी दे रहा है. यह सहयोग ईरान की मिसाइलों की एक्यूरेसी बढ़ा रहा है. सैटेलाइट इमेजरी से रीयल-टाइम लोकेशन पता चलती है, जिससे टारगेटिंग ज्यादा सटीक होती है.
ड्रोन टेक्नोलॉजी से ईरान अपने हमलों को बेहतर प्लान कर सकता है. रूस का मकसद है कि युद्ध लंबा चले, जिससे उसे सैन्य और आर्थिक लाभ मिले. ईरान रूस का सबसे करीबी मध्य पूर्वी साथी है. दोनों देश एक-दूसरे की मदद से पश्चिमी देशों का मुकाबला कर रहे हैं.
अमेरिकी अधिकारियों को शक है कि चीन भी ईरान को टारगेटिंग टेक्नोलॉजी में मदद कर रहा है. हालांकि सबूत कम हैं, लेकिन चीन की हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी दुनिया में सबसे आगे है. कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि चीन के अध्ययन बताते हैं कि अमेरिकी डिफेंस सिस्टम हाइपरसोनिक मिसाइलों को रोकने में असमर्थ हैं.
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ईरान और चीन के बीच तकनीकी सहयोग पुराना है. चीन ईरान को इंजीनियरिंग सपोर्ट और कंपोनेंट्स दे सकता है, जिससे ईरान की मिसाइलें ज्यादा सटीक और तेज बनी हैं. ये कॉर्डिनेशन ट्राएंगल (रूस-चीन-ईरान) अमेरिका के लिए बड़ी चिंता का विषय है.
अगर ईरान की मिसाइलें लगातार सफल होती रहीं तो क्षेत्रीय सुरक्षा का समीकरण बदल जाएगा. जॉर्डन एयर बेस पर हाल के हमले में ईरानी मिसाइलों ने अमेरिकी सैनिकों की जान ली, जो इस नई क्षमता का प्रमाण है.
ईरान दशकों से मिसाइल कार्यक्रम चला रहा है. शुरू में ये स्कड जैसी पुरानी मिसाइलें थीं, लेकिन अब घरेलू उत्पादन में हाइपरसोनिक और मैन्यूवरेबल मिसाइलें शामिल हो गई हैं. IRGC (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स) इस प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहा है. ईरान का कहना है कि ये हथियार रक्षात्मक हैं. इजरायल-अमेरिका के खतरे के खिलाफ हैं. लेकिन पश्चिमी देश इन्हें आक्रामक मानते हैं.
ईरान ने हाल के सालों में कई टेस्ट किए और अपनी रेंज बढ़ाई. फतह मिसाइल की रेंज 1400 किलोमीटर तक बताई जाती है, जो इजरायल और अमेरिकी बेस को कवर करती है. बेहतर गाइडेंस सिस्टम और सैटेलाइट सपोर्ट से निशाना लगाना बेहतर हुआ है. पहले मिसाइलें अक्सर मिस हो जाती थीं, लेकिन अब प्रिसिजन हमले संभव हुए हैं.
अमेरिका और इजरायल अपनी डिफेंस सिस्टम को अपग्रेड करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन हाइपरसोनिक थ्रेट के खिलाफ नई टेक्नोलॉजी की जरूरत है. THAAD और पैट्रियट जैसी सिस्टम पारंपरिक मिसाइलों के लिए बनी हैं. हाइपरसोनिक मिसाइलों की लो अल्टीट्यूड फ्लाइट और रैंडम मैन्यूवर उन्हें मुश्किल बनाते हैं.
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इजरायल में आयरन डोम ने कई रॉकेट रोके, लेकिन लंबी दूरी की हाइपरसोनिक मिसाइलें अलग चुनौती हैं. अमेरिका को डर है कि अगर ईरान की मदद रूस-चीन से बढ़ी तो क्षेत्रीय युद्ध बड़ा रूप ले सकता है. दोनों देश इंटेलिजेंस शेयरिंग बढ़ा रहे हैं. इससे वैश्विक सुरक्षा प्रभावित हो रही है.
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