टेंडर विवाद पर क्यों चुप है बोर्ड? CBSE की खामोशी पर उठे सवाल
टेंडर विवाद पर क्यों चुप है बोर्ड? CBSE की खामोशी पर उठे सवाल

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) के खिलाफ लगे आरोप आने वाले समय में जांच की कसौटी पर टिक पाएंगे या नहीं, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन छात्रों द्वारा उठाए गए सवालों को नजरअंदाज बिल्कुल नहीं किया जा सकता. जब तक बोर्ड इन पर सीधे तौर पर अपना रुख साफ नहीं करता, तब तक Coempt टेंडर विवाद खरीद-प्रक्रिया के साथ-साथ पारदर्शिता और जवाबदेही की एक बड़ी कहानी बना रहेगा.
देश के करोड़ों छात्रों से यह उम्मीद की जाती है कि वे परीक्षा हॉल में लिखे अपने हर एक उत्तर को सही साबित करें और उसका औचित्य (जस्टिफिकेशन) दें. लेकिन, जब इन्हीं छात्रों ने खुद सीबीएसई की अपनी टेंडर प्रक्रिया पर सवाल उठाने शुरू किए, तो उन्हें बोर्ड की तरफ से नाममात्र के स्पष्टीकरण भी नहीं मिले.
ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) कॉन्ट्रैक्ट को लेकर छात्रों द्वारा किए गए एक ऑडिट ने पूरे देश में एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया था. इस घटना के हफ्तों बीत जाने के बाद भी सवाल लगातार बढ़ते जा रहे हैं, जबकि जवाबों का अब भी भारी अकाल है. आज की तारीख में यह बहस सिर्फ हैदराबाद की कंपनी 'कोएम्प्ट एडुटेक' तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि बात अब इस बात पर आ टिकी है कि आखिर सीबीएसई इस पूरे मामले पर खुद सामने आकर सफाई देने से क्यों कतरा रही है.
जब परीक्षा के बाद भी खत्म नहीं हुआ चक्र ज्यादातर छात्रों के लिए बोर्ड परीक्षा का चक्र उसी दिन खत्म हो जाता है जिस दिन नतीजे घोषित होते हैं. लेकिन इस साल ऐसा नहीं हुआ. इसके बजाय, उत्तर पुस्तिकाओं और नव-शुरूआत वाले 'ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम' को लेकर शुरू हुई मामूली चिंताएं अब एक ऐसे विशाल आंदोलन में बदल चुकी हैं, जो भारतीय शिक्षा व्यवस्था के इतिहास में जवाबदेही को लेकर देखी गई सबसे अनोखी बहसों में से एक है.
इस पूरे विवाद के केंद्र में बैठी है 'कोएम्प्ट एडुटेक', जिसे सीबीएसई की डिजिटल मूल्यांकन प्रक्रिया का कॉन्ट्रैक्ट सौंपा गया था. अब इस बात को लेकर सवालों की एक लंबी फेहरिस्त तैयार हो चुकी है कि आखिर इस कंपनी को यह कॉन्ट्रैक्ट शुरुआत में किस आधार पर और कैसे दिया गया था.
जो बात इस पूरे विवाद को सबसे अलग और असाधारण बनाती है, वह यह नहीं है कि आरोप क्या लगाए जा रहे हैं; बल्कि सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि ये आरोप लगा कौन रहा है. ये आरोप किसी प्रतिद्वंद्वी कंपनी ने नहीं लगाए, न ही किसी राजनेता ने और न ही किसी सरकारी खरीद-निगरानी संस्था ने उठाए हैं.
इन्हें उठाने वाले कोई और नहीं, बल्कि खुद छात्र हैं.
विवाद के केंद्र में मौजूद 3 बुनियादी सवाल सार्वजनिक रूप से उठाए गए इन मुद्दों का मुख्य फोकस इस बात पर है कि क्या टेंडर की शर्तों में किए गए बदलावों ने बोली लगाने (Bidding Process) की प्रतिस्पर्धा के पूरे माहौल को ही बदल दिया? और क्या उन बदलावों के लिए एक विस्तृत और ठोस स्पष्टीकरण की आवश्यकता नहीं थी?
यहाँ यह साफ कर देना जरूरी है कि वर्तमान में ऐसी कोई आधिकारिक रिपोर्ट या निष्कर्ष सामने नहीं आया है जिससे यह साबित हो सके कि टेंडर में कोई धांधली हुई थी या इसे अवैध तरीके से आवंटित किया गया था. किसी भी जांच एजेंसी ने सार्वजनिक रूप से यह नहीं कहा है कि इसमें भ्रष्टाचार हुआ है, और न ही किसी अथॉरिटी ने कोएम्प्ट एडुटेक या सीबीएसई की तरफ से किसी गलत काम की पुष्टि की है.
फिर भी, जनता का भरोसा सिर्फ कानूनी फैसलों या क्लीन चिट पर निर्भर नहीं होता. वह पूरी तरह से पारदर्शिता पर टिका होता है.
आलोचकों द्वारा उठाया जा रहा केंद्रीय सवाल सिर्फ यह नहीं है कि क्या यह प्रक्रिया खरीद के नियमों के अनुरूप थी या नहीं. बल्कि, वे तीन बुनियादी सवाल पूछ रहे हैं:
क्या सीबीएसई ने पर्याप्त रूप से यह समझाया है कि टेंडर प्रक्रिया के दौरान अचानक पात्रता संबंधी कुछ अनिवार्य शर्तों को क्यों बदल दिया गया था?
क्या उन बदलावों का अंतिम लाभ कोएम्प्ट एडुटेक को मिला, जिससे उसने टीसीएस (TCS) जैसी बड़ी कंपनी को पछाड़कर यह कॉन्ट्रैक्ट हासिल कर लिया?
ये सवाल शायद सरकारी खरीद के भारी-भरकम दस्तावेजों के नीचे ही दफन रह जाते, अगर इन्हें जांचकर्ताओं के एक ऐसे अप्रत्याशित समूह ने बाहर न निकाला होता जो खुद इस पूरी व्यवस्था से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देश के युवा छात्र हैं.
वो टीनेजर्स जिन्होंने खोला सच यह विवाद तब और तेज हो गया जब 12वीं कक्षा के एक छात्र, सार्थक सिद्धांत ने ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रोजेक्ट से जुड़े सीबीएसई के सार्वजनिक रूप से उपलब्ध टेंडर रिकॉर्ड्स की बारीकी से जांच करनी शुरू की.
उसका पूरा विश्लेषण टेंडर दस्तावेजों के अलग-अलग वर्जनों में पात्रता मानदंडों (Eligibility Criteria) और तकनीकी आवश्यकताओं में समय के साथ किए गए बदलावों पर केंद्रित था. सार्वजनिक डोमेन में मौजूद खरीद रिकॉर्ड्स का उपयोग करते हुए, उसने दलील दी कि कई शर्तें समय के साथ इस तरह से बदली गईं जो गहरी और गहन जांच की मांग करती हैं. यह मामला राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान खींचने से पहले इंटरनेट और सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गया.
जल्द ही, अन्य छात्र, युवा शोधकर्ता और तकनीकी विशेषज्ञ भी इन दस्तावेजों की अपनी-अपनी समीक्षा करने में जुट गए. नंबरों पर बहस करने के बजाय, ये युवा अब टेंडर की धाराओं की तुलना कर रहे थे. आंसर-की पर बहस करने के बजाय, वे सरकारी खरीद प्रक्रियाओं की जांच कर रहे थे.
यह भूमिकाओं का एक बेहद चौंकाने वाला उलटफेर था. जो संस्थान छात्रों का मूल्यांकन करने के लिए जिम्मेदार है, अचानक खुद छात्रों द्वारा उसका मूल्यांकन किया जा रहा था.
जब टेंडर की प्रक्रिया राष्ट्रीय बहस बन गई यह मुद्दा शिक्षा के गलियारों से बाहर निकलकर तब एक बड़ा राष्ट्रीय विमर्श बन गया, जब राजनीतिक नेताओं ने भी इन चिंताओं को आवाज देना शुरू किया. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सार्वजनिक रूप से टेंडर की शर्तों में बदलाव के घटनाक्रम पर सवाल उठाए और खरीद प्रक्रिया की कड़ी जांच की मांग की. आम आदमी पार्टी (AAP) के अरविंद केजरीवाल ने भी छात्र जांचकर्ताओं द्वारा उठाई गई चिंताओं को प्रमुखता से रेखांकित किया और सार्वजनिक डोमेन में चल रहे आरोपों की तरफ सबका ध्यान खींचा.
इन राजनीतिक हस्तक्षेपों का महत्व राजनीति में नहीं, बल्कि घटनाओं के इस क्रम (सीक्वेंस) में छिपा है. राजनेताओं ने इस विवाद को पैदा नहीं किया, उन्होंने तो बस इसका अनुसरण किया. सवाल उन छात्रों से शुरू हुए थे जिन्होंने उन दस्तावेजों का अध्ययन करने में हफ्तों बिताए, जिन्हें पढ़ने की जहमत ज्यादातर वयस्क (एडल्ट) कभी नहीं उठाते.
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