'अपना मुस्लिम नाम रखते हैं...' पाकिस्तान में किस हाल में रह रहे हिंदू?
'अपना मुस्लिम नाम रखते हैं...' पाकिस्तान में किस हाल में रह रहे हिंदू?

"अगर कराची या इस्लामाबाद जाना हो तो अपना नाम मत बताना... कोई पूछे तो हिंदू होने की पहचान छिपा लेना."
ये सलाह पाकिस्तान में पले-बढ़े सोभराज भील को बचपन से मिलती रही. सोभराज करीब 40 साल पाकिस्तान में रहे और 2014 में भारत आ गए. उनका कहना है कि सिंध में हिंदुओं की आबादी ज्यादा होने की वजह से हालात दूसरे इलाकों के मुकाबले कुछ बेहतर हैं, लेकिन जैसे ही दूसरे शहरों में निकलते हैं, पहचान छिपाने की जरूरत महसूस होने लगती है. पहचान छुपानी होती है हिंदू होने की.
पाकिस्तान में हिंदुओं की जिंदगी आखिर कैसी है? क्या वे खुले तौर पर अपने धर्म का पालन कर पाते हैं? क्या दिवाली और होली भारत जैसी धूमधाम से मनाई जाती है? स्कूलों में हिंदू बच्चों को क्या पढ़ाया जाता है? और क्यों कई हिंदू परिवार अपने बच्चों के नाम तक बदलने लगे हैं?
आजतक डॉट इन ने पाकिस्तान में कई दशक बिताकर भारत आए हिंदुओं से बातचीत की. अब हम सीरीज ‘सरहद पार के हिंदू’ के जरिए बता रहे हैं कि उनकी जिंदगी वहां कैसी है और वहां कैसा माहौल है और भारत आने के बाद उनकी जिंदगी कैसी है? आज पार्ट-1 में बात करते हैं पाकिस्तान में हिंदुओं का जीवन कैसा है…
पाकिस्तान की 2023 की जनगणना के मुताबिक, देश में करीब 38 लाख हिंदू हैं, जो कुल आबादी का करीब 1.61 प्रतिशत हैं. इनमें 90 फीसदी आबादी सिंध में रहती है. पाकिस्तान में हिंदुओं की गणना दो श्रेणियों- जाति हिंदू (Caste Hindus) और अनुसूचित जाति हिंदू (Scheduled Castes) में भी की जाती है. वैसे पाकिस्तान में हिंदुओं की संख्या को लेकर अलग-अलग दावे हैं. वहां की हिंदू पंचायत उनकी संख्या 50 लाख से ज्यादा होने का दावा करती है और कई रिपोर्ट्स 38 लाख से 50 लाख तक बताती हैं.
सरकारी डेटा के हिसाब से साल 1981 में करीब 12.8 लाख हिंदू थे, जबकि 1998 में 24 लाख, 2017 में 35 लाख और 2023 में 38 लाख थे. अगर प्रतिशत में देखें तो वहां की कुल आबादी में हिंदुओं का प्रतिशत हमेशा से 1 से 2 फीसदी रहा है.
अक्सर ये दावा किया जाता है कि एक वक्त था पाकिस्तान में 23 फीसदी हिंदू थे, जो अब 2 फीसदी रह गए हैं. लेकिन, वो बात उस वक्त की है, जब पाकिस्तान से बांग्लादेश अलग नहीं हुआ था. आजादी के वक्त पाकिस्तान में 12.9 फीसदी हिंदू थे, जिसमें ईस्ट पाकिस्तान यानी आज के बांग्लादेश में 22.0 फीसदी और वेस्ट पाकिस्तान यानी आज के पाकिस्तान में 1.6 फीसदी मुस्लिम थे. समय के साथ आबादी बढ़ी जरूर है, लेकिन कुल जनसंख्या में उनकी हिस्सेदारी सीमित रही है.
अगर सभी अल्पसंख्यकों की बात करें तो साल 2022 में NADRA की ओर से जारी की गए आंकड़ों के अनुसार, पाकिस्तान में 2,201,566 हिंदू थे जबकि अहमदी 188,340 और ईसाई 1,873,348 थे. इनके अलावा सिखों की संख्या 7413 थी, बहाई धर्म को मानने वाले 14,537 लोग थे.
सिंध में जिंदगी कुछ आसान, लेकिन पूरे पाकिस्तान की कहानी अलग
भारत की नागरिकता ले चुके सोभराज बताते हैं कि उन्होंने अपना अधिकांश जीवन सिंध में बिताया, जहां हिंदुओं की संख्या अपेक्षाकृत अधिक है. इसलिए वहां धार्मिक गतिविधियां दूसरे इलाकों की तुलना में अपेक्षाकृत आसान रहती हैं. लेकिन जैसे ही कराची, मुल्तान या इस्लामाबाद जैसे शहरों में जाना पड़ता है, माहौल बदल जाता है.
'सिंध में हिंदू ज्यादा हैं, इसलिए वहां उतनी दिक्कत नहीं होती. लेकिन अगर कराची, मुल्तान या इस्लामाबाद जाना पड़े तो पहचान छिपाकर जाना पड़ता है. नाम बताने से भी डर लगता है. पुलिस लूटने को तैयार रहती है.' — सोभराज भील
वहीं, पाकिस्तान से 2014 में भारत आए जान बहादुर सिंह भी लगभग यही बात कहते हैं. उनके मुताबिक गांवों में रहने वाले हिंदू अक्सर सिर झुकाकर जिंदगी जीने को मजबूर होते हैं. वो बताते हैं कि वहां हिंदू बस जी रहे हैं. सिर उठाकर नहीं रह सकते. जाति का भेदभाव कम है, लेकिन हिंदू और मुसलमान का भेदभाव बहुत ज्यादा है.
भारत आने वाले पाकिस्तानी हिंदुओं के लिए 35 सालों से काम कर रहे हिंदू सिंह सोढ़ा का कहना है कि वहां हिंदुओं को जिंदगी एकदम नरक हो रखी है.
‘पाकिस्तान में हिंदुओं के सामने सबसे बड़ी समस्या धार्मिक उत्पीड़न है. वहां धार्मिक उत्पीड़न चरम पर है. एक-एक दिन काटना मुश्किल है.’- हिंदू सिंह सोढ़ा
भारत में दिवाली कई दिन पहले शुरू हो जाती है. बाजार सज जाते हैं, घर रोशनी से भर जाते हैं और हर तरफ उत्सव का माहौल दिखाई देता है. पाकिस्तान से आए हिंदुओं का कहना है कि वहां त्योहार मनाए तो जाते हैं, लेकिन सीमित दायरे में. हमें वहां से आए हिंदुओं ने बताया, ‘दिवाली पर पूजा कर लेते थे, कुछ दिए जला लेते थे, अपने लोगों में इकट्ठे होकर त्योहार मना लेते थे. लेकिन भारत जैसी रौनक वहां नहीं होती. यहां हर तरफ दिवाली दिखती है, वहां ऐसा माहौल नहीं होता.’
पाकिस्तान से साल 2011 में भारत आए दिलीप सिंह सोढ़ा भी कहते हैं कि वहां हिंदू त्यौहार भी डर के साये में मना रहे हैं.
‘वहां त्यौहार सिर्फ मजबूरी में मनाया जा रहा है. लोगों में उल्लास नहीं रहता और डर के माहौल के बीच में वो ऐसा करते हैं.’ - दिलीप सिंह सोढ़ा
जान बहादुर सिंह कहते हैं कि धार्मिक आयोजन भी बहुत सीमित तरीके से करने पड़ते हैं.
'होली-दिवाली मनाते तो हैं, लेकिन दस घरों के बीच. अगर रंग किसी पर लग जाए तो विवाद हो जाता है और रंग वगैहरा मुस्लिम मस्जिद के आसपास नहीं खेल सकते. वहीं, अगर भजन चलाना है तो धीरे आवाज में चलाइए. तेज आवाज में त्योहार मनाना आसान नहीं है.' — जान बहादुर सिंह
पाकिस्तान में शादियों पर पूरी तरह रोक जैसी स्थिति नहीं है. बारात निकलती है, बैंड भी बजता है, लेकिन कई लोग कहते हैं कि तेज आवाज से बचना पड़ता है. वहां, तेज आवाज में कार्यक्रम करने से लोग बचते हैं.
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