रोहित को हटाकर क्या भारत जीत जाएगा? असली सवाल यही है
रोहित को हटाकर क्या भारत जीत जाएगा? असली सवाल यही है

भारतीय क्रिकेट में सबसे मुश्किल काम सिर्फ टीम चुनना नहीं होता, बल्कि यह तय करना होता है कि कब एक युग खत्म होगा और दूसरा शुरू होगा. सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़, वीवीएस लक्ष्मण, महेंद्र सिंह धोनी... हर दौर में यह सवाल उठा. आज वही सवाल रोहित शर्मा के सामने खड़ा है.
रिपोर्ट कहती है कि चयन समिति 2027 वनडे विश्व कप की योजनाओं में रोहित शर्मा को नहीं देख रही. अगर ऐसा है तो यह सिर्फ एक खिलाड़ी के भविष्य का फैसला नहीं, बल्कि भारतीय क्रिकेट के अगले दो वर्षों की दिशा तय करने वाला निर्णय होगा. लेकिन इन सबके बीच बीसीसीआई के सचिव देवजीत सैकिया ने स्पष्ट किया है कि रविवार को लॉर्ड्स के ऐतिहासिक मैदान पर इंग्लैंड के खिलाफ होने वाला मुकाबला रोहित शर्मा के वनडे करियर का आखिरी मैच नहीं होगा.यह भी पढ़ें: 'लॉर्ड्स वनडे नहीं होगा रोहित का आखिरी मैच', हिटमैन के संन्यास की खबरों पर BCCI का पूर्णविराम
लेकिन, सवाल है क्या रोहित को लेकर फैसला इतना आसान है?
रोहित के पक्ष में सबसे बड़ी दलील... अनुभव का कोई विकल्प नहीं
किसी खिलाड़ी का मूल्य हमेशा उसके औसत या स्ट्राइक रेट से नहीं मापा जाता. रोहित शर्मा वह बल्लेबाज हैं, जिन्होंने भारत को आईसीसी ट्रॉफी जिताई, बड़े टूर्नामेंटों में लगातार रन बनाए और कप्तान के तौर पर टीम की मानसिकता बदल दी. बड़े मैचों में उनका अनुभव भारतीय क्रिकेट की सबसे बड़ी पूंजी है.
2027 विश्व कप दक्षिण अफ्रीका में खेला जाएगा. वहां की तेज और उछालभरी पिचों पर सिर्फ प्रतिभा नहीं, धैर्य और अनुभव भी मैच जिताते हैं. ऐसे में यह तर्क पूरी तरह वाजिब है कि भारत को वहां रोहित जैसे बल्लेबाज की जरूरत पड़ सकती है.यह भी पढ़ें: 891 रन झूठ नहीं बोलते! रोहित शर्मा पर 'अंतिम' फैसला करने से पहले BCCI ये रिकॉर्ड जरूर देखे
दूसरी बात, रोहित पिछले कुछ समय से अपनी फिटनेस पर लगातार काम कर रहे हैं. वजन कम हुआ है, मूवमेंट बेहतर दिख रही है और हालिया मुकाबलों में बल्लेबाजी भी पहले से अधिक सकारात्मक नजर आई है.
अगर कोई खिलाड़ी फिट है और प्रदर्शन कर रहा है, तो उसे सिर्फ इसलिए बाहर करना कि वह 2027 में 40 साल का होगा, क्रिकेट की भावना के खिलाफ माना जाएगा.
सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि क्या रोहित को भी विराट कोहली की तरह 'विश्वास का क्रेडिट' नहीं मिलना चाहिए?
अगर विराट कोहली की क्लास पर भरोसा किया जा सकता है, तो रोहित शर्मा के बड़े मैचों के रिकॉर्ड पर भरोसा क्यों नहीं? क्या भारतीय क्रिकेट दोनों दिग्गजों के लिए अलग-अलग पैमाना अपना रहा है.
महान खिलाड़ियों को हर सीरीज के बाद 'परफॉर्म या बाहर' के दबाव में रखना शायद उस विरासत के साथ न्याय नहीं होगा, जो उन्होंने भारतीय क्रिकेट को दी है.
भावनाएं अपनी जगह हैं, लेकिन चयन का काम भविष्य देखना होता है. 2027 विश्व कप से पहले भारत के पास बहुत ज्यादा वनडे मैच नहीं हैं. अगर चयन समिति ने यशस्वी जायसवाल को भविष्य का ओपनर मान लिया है, तो उन्हें लगातार मौके देना भी जरूरी होगा.
क्रिकेट में अनुभव मैदान पर मिलता है, नेट्स में नहीं. अगर हर बड़े खिलाड़ी के लिए बदलाव टाल दिया जाए, तो नई पीढ़ी कभी तैयार नहीं होगी.
रोहित की उम्र भी एक सच्चाई है. 2027 तक वह 40 वर्ष के पार होंगे. उम्र बढ़ने के साथ फिटनेस बनाए रखना आसान नहीं होता. दक्षिण अफ्रीका जैसी कठिन परिस्थितियों में लगातार खेलने की क्षमता पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
अगर अगले डेढ़-दो साल में उनकी फॉर्म गिरती है, तो चयनकर्ताओं के लिए फैसला और भी आसान हो जाएगा. यानी चयन समिति का नजरिया भी पूरी तरह गलत नहीं कहा जा सकता.
सोशल मीडिया पर यह बहस अब सिर्फ रोहित शर्मा तक सीमित नहीं रह गई है.
एक वर्ग मानता है कि रोहित और विराट जैसे खिलाड़ियों का सम्मान होना चाहिए. जिन्होंने भारतीय क्रिकेट को विश्व विजेता बनाया, उनके करियर का फैसला कुछ पारियों से नहीं होना चाहिए.
दूसरा वर्ग कहता है कि भारतीय क्रिकेट को अब भविष्य देखना होगा. अगर बदलाव करना है तो आज करना होगा, कल नहीं.
वहीं तीसरी राय यह भी है कि गौतम गंभीर और अजीत अगरकर के नाम पर अनावश्यक विवाद खड़ा किया जा रहा है. ट्रांजिशन हर टीम में होता है, लेकिन भारत में उसे अक्सर ड्रामा बना दिया जाता है.
रोहित के समर्थक गलत नहीं हैं, क्योंकि अनुभव की कीमत कभी कम नहीं होती. चयनकर्ता भी गलत नहीं हैं, क्योंकि भविष्य की टीम आज ही तैयार करनी पड़ती है. असल चुनौती संतुलन बनाने की है.
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