कहां फटेगा बादल? भारतीय वैज्ञानिकों ने ढूंढ लिया इसका जवाब

राष्ट्रीय समाचार

कहां फटेगा बादल? भारतीय वैज्ञानिकों ने ढूंढ लिया इसका जवाब

14 जुलाई 2026 को 07:30 am बजे
कहां फटेगा बादल? भारतीय वैज्ञानिकों ने ढूंढ लिया इसका जवाब

हर साल मॉनसून में पहाड़ों पर बादल फटने, अचानक तेज बारिश और फ्लैश फ्लड जैसी घटनाएं लोगों के लिए बड़ी मुसीबत बनती हैं. ऐसे में अगर पहले से पता चल जाए कि किस इलाके में ज्यादा खतरा है, तो लोगों की जान बचाई जा सकती है. नुकसान भी कम किया जा सकता है. इसी को ध्यान में रखते हुए भारतीय वैज्ञानिकों ने नया क्लाइमेट मॉडल तैयार किया है. उनका कहना है कि यह मॉडल पहले से बेहतर तरीके से बता सकता है कि पश्चिमी हिमालय के किन इलाकों में बादल फट सकता है, या बहुत तेज बारिश का खतरा हो सकता है.

यह मॉडल राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (NIH), रुड़की के वैज्ञानिकों ने बनाया है. इसे 1979 से 2014 तक यानी 36 साल के मौसम के रिकॉर्ड पर परखा गया है. सुपरकंप्यूटर की मदद से तैयार इस मॉडल का रिजोल्यूशन 9 किलोमीटर है. यानी यह हर 9 किलोमीटर के इलाके का अलग-अलग मौसम समझ सकता है.

यह भी पढ़ें: 10 हजार KM लंबा बादलों का कारवां, बंगाल की खाड़ी पहुंचा तो झमाझम होगी बारिश

वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे बारिश, बर्फबारी और तापमान का अनुमान पहले के मुकाबले ज्यादा सटीक लगाया जा सकेगा. इसका सबसे ज्यादा फायदा जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों को हो सकता है.

पहाड़ों का मौसम बहुत तेजी से बदलता है. कई बार कुछ किलोमीटर की दूरी पर ही मौसम बिल्कुल अलग होता है. एक जगह हल्की बारिश होती है, जबकि पास के इलाके में अचानक बहुत तेज बारिश या बादल फट जाता है. पुराने मौसम मॉडल इतने छोटे बदलावों को ठीक से नहीं पकड़ पाते. इसलिए वैज्ञानिक काफी समय से ऐसा मॉडल बनाने की कोशिश कर रहे थे, जो छोटे इलाकों का मौसम भी बेहतर तरीके से समझ सके.

नया मॉडल इसी सोच के साथ तैयार किया गया है. इसमें हर 9 किलोमीटर के इलाके का अलग-अलग विश्लेषण किया जाता है. इससे यह समझना आसान होगा कि किस जगह कितनी बारिश हो सकती है. कहां अचानक बहुत तेज बारिश का खतरा ज्यादा है. यह मॉडल पहाड़ों की ऊंचाई और वहां की स्थानीय मौसम की स्थिति को भी ध्यान में रखता है.

यह भी पढ़ें: रूठा हुआ मॉनसून लौटने वाला है... 'आकाशवाणी' से आया संदेश, झमाझम बारिश के लिए रहिए तैयार

वैज्ञानिकों ने इस मॉडल को 1979 से 2014 तक के मौसम के रिकॉर्ड से जांचा. इसमें मॉनसून की बारिश, पश्चिमी विक्षोभ से होने वाली बर्फबारी और तापमान जैसे कई पहलुओं की तुलना असली आंकड़ों से की गई. वैज्ञानिकों का कहना है कि कई मामलों में इस मॉडल ने पुराने ग्लोबल क्लाइमेट मॉडल से बेहतर नतीजे दिए.

अगर पहले से पता चल जाए कि किसी इलाके में बहुत तेज बारिश या बादल फटने का खतरा है, तो प्रशासन समय रहते लोगों को सुरक्षित जगह पहुंचा सकता है. इससे फ्लैश फ्लड, भूस्खलन और दूसरी प्राकृतिक आपदाओं में होने वाला नुकसान कम किया जा सकता है. चारधाम यात्रा जैसे रास्तों पर भी यह जानकारी काम आ सकती है.

यह मॉडल सिर्फ बादल फटने का खतरा बताने तक सीमित नहीं है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, इससे पानी के बेहतर इस्तेमाल का प्लान बनाने, सड़क और पुल जैसी प्रोजेक्ट्स की तैयारी करने, खेती और क्लाइमेट चेंज पर रिसर्च में भी मदद मिलेगी. आने वाले समय में ऐसे मॉडल मौसम की भविष्यवाणी को और ज्यादा भरोसेमंद बना सकते हैं.

शेयर करें
हिंदी खबर नेटवर्क पर पढ़ें ताज़ा हिंदी समाचार।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Hyderabad News: 58 हजार करोड़ से बदलेगी मूसी नदी की सूरत, लंदन की टेम्स की तर्ज पर बनेगा रिवरफ्रंट

बॉक्स ऑफिस कलेक्शन: पहले दिन 100 करोड़ पार 'टॉक्सिक', शाहरुख और रणवीर सिंह की इन फिल्मों का तोड़ डाला रिकॉर्ड

Toxic Box Office Collection Day 1: यश की टॉक्सिक ने पहले दिन कमाए 140 करोड़, जवान और एनिमल को छोड़ा पीछे