आल‍िया की 'अल्फा' में ऋतिक रोशन का होना है सबसे बड़ा धोखा!

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आल‍िया की 'अल्फा' में ऋतिक रोशन का होना है सबसे बड़ा धोखा!

04 जुलाई 2026 को 07:50 am बजे
आल‍िया की 'अल्फा' में ऋतिक रोशन का होना है सबसे बड़ा धोखा!

'इस बार सीता आज लंका खुद जलाने आई है...' इस दमदार डायलॉग के साथ यशराज फिल्म्स (YRF) के स्पाई यूनिवर्स की मच-अवेटेड फिल्म 'अल्फा' आखिरकार सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है. इसे महिला-केंद्रित स्पाई एक्शन फिल्म के तौर पर जोर-शोर से प्रमोट किया गया है, जिसकी पूरी कहानी आलिया भट्ट और शरवरी वाघ के इर्द-गिर्द घूमती है. फिल्म में दोनों ही एक्ट्रेसेस ने दमदार एक्शन सीन्स किए हैं, जिसे ऑडियंस पसंद भी कर रही हैं. इसके साथ ही फिल्म में ऋतिक रोशन का 'कबीर' के रूप में एक धमाकेदार कैमियो भी देखने को मिला है, जिसकी सोशल मीडिया पर खूब तारीफ हो रही है.

लेकिन इस कैमियो और फिल्म ने बहस करने वाले विचार को जन्म भी दे दिया है. सवाल यह उठ रहा है कि जब आप एक पूरी तरह से महिला-केंद्रित जासूसी फिल्म बना रहे हैं, तो उसमें कबीर जैसे बड़े पुरुष किरदार की एंट्री कराने की क्या मजबूरी थी? क्या आज भी हमारे मेकर्स को लगता है कि एक महिला जासूस बिना किसी पुरुष के सहारे के अकेले पूरा मिशन नहीं संभाल सकती?

महिला जासूस के लिए ही पुरुषों का सहारा क्यों? इस फिल्म को देखने के बाद सबसे पहला और जायज सवाल यही दिमाग में आता है कि जब आप इसे 'पहली महिला-केंद्रित स्पाई फिल्म' के रूप में दर्शकों के सामने पेश कर रहे हैं, तो इसमें पुरुषों का दबदबा इतना ज्यादा क्यों दिखाया गया? जब 'टाइगर', 'पठान' या 'वॉर' जैसी फिल्में बनती हैं, तो वहां सलमान खान, शाहरुख खान या ऋतिक रोशन को किसी मिशन को पूरा करने या अपनी जान बचाने के लिए किसी फीमेल स्पाई के बड़े सपोर्ट की जरूरत नहीं पड़ती. वे अकेले ही पूरी फौज से लड़ जाते हैं. लेकिन जब बारी एक महिला जासूस की आई, तो कहानी में पुरुषों का इन्वॉल्वमेंट इस कदर बढ़ा दिया गया कि वह मुख्य किरदारों पर ही भारी पड़ता दिखने लगा.

अनिल कपूर दखल और ऋतिक की एंट्री फिल्म में अनिल कपूर के किरदार (विक्रांत कौल) का इन्वॉल्वमेंट भी कई सवाल खड़े करता है. कहानी में एक मोड़ ऐसा आता है जहां अनिल कपूर का किरदार इन महिला जासूसों को सेव करता है. हद तो तब हो जाती है जब मुसीबत के वक्त कबीर (ऋतिक रोशन) की एंट्री होती है, और ऐसा लगता है कि अगर कबीर वहां नहीं आता, तो शायद आलिया और शरवरी के किरदार वहीं मर जाते. यह सोच अपने आप में परेशान करने वाली है.

क्या मेकर्स के बैक ऑफ द माइंड में आज भी यह धारणा बैठी हुई है कि औरतें चाहे कितनी भी ट्रेनिंग ले लें, वे अकेले चीजें नहीं संभाल सकतीं? अगर आप किसी फिल्म को विमेन-ओरिएंटेड कहकर प्रमोट कर रहे हैं, तो कम से कम पर्दे पर उस बात और उस सोच पर कायम तो रहिए.

कटरीना या दीपिका क्यों नहीं आ सकती? यशराज फिल्म्स के इसी स्पाई यूनिवर्स में कटरीना कैफ (जोया) और दीपिका पादुकोण (रूबई) पहले ही अपने दमदार एक्शन अवतार से दर्शकों को इम्प्रेस कर चुकी हैं. वे दोनों ही ट्रेंड और खतरनाक जासूसों के रोल में लोगों के जहन में हैं. ऐसे में एक बड़ा विचार यह आता है कि अगर इस महिला-केंद्रित फिल्म में आलिया और शरवरी की मदद के लिए कबीर की जगह जोया या रूबई की एंट्री कराई जाती, तो वह सीन कितना शानदार और सही मायनों में विमेन एम्पावरमेंट को दिखाने वाला होता.

दो महिला जासूसों की मदद के लिए दो दूसरी सीनियर महिला जासूसों का आना पूरी तरह से फिल्म के थीम को सपोर्ट करता, लेकिन मेकर्स ने यहां भी एक पुरुष सुपरस्टार के कैमियो का सहारा लेना ज्यादा बेहतर समझा. वहीं सोशल मीडिया पर भी लोगों ने इसे बढ़ा चढ़ाकर पेश किया कि महफिल तो ऋतिक रोशन ने ही लूटी.

'मर्दानी' की रानी मुखर्जी से क्यों नहीं ली सीख? अगर हम यशराज फिल्म्स के ही पिछले ट्रैक रिकॉर्ड को देखें, तो उनके बैनर तले 'मर्दानी' जैसी बेहतरीन फिल्म बन चुकी है. उस फिल्म में रानी मुखर्जी ने एक पुलिस अफसर के किरदार में अकेले ही पूरे मानव तस्करी के रैकेट को नेस्तनाबूद कर दिया था. उन्हें अपनी जान बचाने या विलेन को सबक सिखाने के लिए किसी बड़े पुरुष एक्टर या किसी 'मसीहा' की मदद की जरूरत नहीं पड़ी थी. वह अपने दम पर लड़ीं और जीतीं.

तो फिर 'अल्फा' जैसी बड़े बजट की स्पाई थ्रिलर फिल्म में, जहां किरदार इंटरनेशनल लेवल के जासूस हैं, वहां कबीर को रक्षक बनाकर पेश करने का क्या तुक था? क्या महिलाएं बिना किसी पुरुष के अपने दम पर लड़ और बच नहीं सकतीं?

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