सतलुज, उड़ता पंजाब, माचिस... वो फिल्में, जो चुनावी मंच तक पहुंचीं

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सतलुज, उड़ता पंजाब, माचिस... वो फिल्में, जो चुनावी मंच तक पहुंचीं

07 जुलाई 2026 को 08:47 am बजे
सतलुज, उड़ता पंजाब, माचिस... वो फिल्में, जो चुनावी मंच तक पहुंचीं

पंजाब की राजनीति में फिल्मों का रिश्ता सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा. यहां की कई कहानियां बड़े पर्दे से होते हुए चुनावी मंच तक पहुंच गईं. और फिर किसी पार्टी का खेल बनाया, तो किसी को बिगाड़ दिया. कभी आतंकवाद और पुलिस कार्रवाई पर बनी फिल्म ने सत्ता विरोधी माहौल को हवा दी, तो कभी नशे के मुद्दे पर बनी फिल्म ने सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया. अब यही चर्चा एक बार फिर दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' (पंजाब-95) को लेकर हो रही है.

ZEE5 पर रिलीज होने के कुछ ही समय बाद फिल्म का टेलीकास्ट रोक दिया गया. इसके बाद अकाली दल, एसजीपीसी और कई सिख संगठनों ने इसे सेंसरशिप और सिख इतिहास से जुड़ा मुद्दा बताया, जबकि दूसरी ओर यह सवाल भी उठने लगा कि क्या पंजाब चुनाव से पहले एक बार फिर कोई फिल्म राजनीतिक नैरेटिव बनाने की जमीन तैयार कर रही है?

अगर पंजाब की चुनावी राजनीति का इतिहास देखें तो 'माचिस', 'उड़ता पंजाब' और अब 'सतलुज' में एक समानता दिखाई देती है. तीनों ने पंजाब के सबसे संवेदनशील मुद्दों को छुआ. तीनों ही पंजाब के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले रिलीज हुईं. लिहाजा, तीनों को लेकर राजनीति अपने चरम पर पहुंच गई.

Satluj may have paused. But the conversation it started hasn’t. Thank you for the incredible love. We hope to bring it back soon.#Satluj pic.twitter.com/Ox3MZIBvlT

Shocked and saddened by the arbitrary removal of #Satluj from #ZEE5 in India. A powerful film that courageously unveils Punjab’s painful history and honours the supreme sacrifice of S. Jaswant Singh Ji Khalra cannot be silenced this way. This is not mere censorship — it is an… pic.twitter.com/yfrkMKYq5D

1996 में गुलजार की चंद्रचूड़ सिंह और तबू जैसे कलाकारों को लेकर बनाई गई फिल्म 'माचिस' रिलीज हुई. इस फिल्म का गाना ‘चप्पा-चप्पा चरखा चले बहुत मशहूर हुआ. फिल्म की स्टोरी 1980 और 90 के दशक के पंजाब में फैले आतंकवाद और कथित पुलिस अत्याचारों के इर्द-गिर्द थी. फिल्म यह दिखाने की कोशिश करती है कि किस तरह सामान्य युवक परिस्थितियों और पुलिस ज्यादती के कारण हथियार उठाने को मजबूर हो जाते हैं.

फिल्म को समीक्षकों ने खूब सराहा, लेकिन इसका असर केवल सिनेमाघरों तक सीमित नहीं रहा. अगले ही साल 1997 में पंजाब विधानसभा चुनाव होने थे.

आतंकवाद से निपटने के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर विपक्ष लगातार कांग्रेस पर सवाल उठा रहा था. अकाली दल ने इसी मुद्दे को चुनावी अभियान का बड़ा हिस्सा बनाया. 'माचिस' ने उस दौर की पीड़ा को आम लोगों के सामने भावनात्मक तरीके से रखा. इससे पुलिस कार्रवाई और मानवाधिकार उल्लंघन पर बहस तेज हुई, जिसका राजनीतिक फायदा अकाली दल-भाजपा गठबंधन को मिला. और उन्होंने चुनाव स्वीप कर दिया. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद से सत्ता में आई कांग्रेस 13 साल बाद 117 सीटों वाली विधानसभा में महज 14 सीटों पर सिमट गई.

केवल फिल्म की वजह से चुनावी नतीजे नहीं बदले, लेकिन इतना जरूर माना गया कि फिल्म ने उस दौर के राजनीतिक विमर्श को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

उड़ता पंजाब: जब नशा चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया

करीब दो दशक बाद पंजाब की राजनीति में एक और फिल्म ने भूचाल ला दिया. 2016 में रिलीज हुई 'उड़ता पंजाब' का विषय था पंजाब में तेजी से फैलती नशाखोरी. फिल्म में यह दिखाया गया कि किस तरह ड्रग्स का नेटवर्क राजनीति तक फैला हुआ है.

फिल्म रिलीज होने से पहले ही विवादों में आ गई. सेंसर बोर्ड CBFC के तत्कालीन चेयरमैन पहलज निहलानी का नजरिया बहुत सख्त था. बोर्ड ने 89 से 94 कट्स मांगे थे. पंजाब का नाम हटाओ, चुनाव, पार्टी, MLA, MP जैसे शब्द हटाओ, गालियां म्यूट करो, ड्रग इंजेक्शन के क्लोजअप हटाओ, टाइटल से 'पंजाब' हटाने को कहा गया. रिवाइजिंग कमेटी ने भी कम से कम 13 कट्स तो मांग ही. लेकिन फिल्ममेकर्स कोर्ट गए. बॉम्बे हाईकोर्ट ने सिर्फ 1 कट के साथ रिलीज की इजाजत दे दी. कोर्ट ने CBFC की तीखी आलोचना की.

उस समय पंजाब में अकाली दल-भाजपा गठबंधन की सरकार थी. विपक्षी दल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ड्रग्स के मुद्दे पर सरकार को घेर रही थी. फिल्म आने के बाद यह मुद्दा और ज्यादा चर्चा में आ गया. फिल्म के निर्माताओं और विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि पंजाब सरकार चुनाव से पहले नशे के मुद्दे को दबाना चाहती है. और इस तरह 2017 के विधानसभा चुनाव में नशा सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बन गया. कांग्रेस ने "नशा मुक्त पंजाब" का वादा किया. आम आदमी पार्टी ने भी इसे अपनी प्रमुख चुनावी मुहिम बनाया. अकाली दल के कई नेताओं पर ड्रग्स तस्करी में शामिल होने के आरोप लगाए गए. आखिर अकाली दल को सत्ता गंवानी पड़ी और कांग्रेस सरकार बनाने में सफल रही.

अब चर्चा 'सतलुज' की है, जिसे पहले 'पंजाब-95' नाम दिया गया था. यह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है. खालड़ा ने 90 के दशक में पंजाब में आतंकवाद के नाम पर कथित फर्जी एनकाउंटर और लावारिस शवों के अंतिम संस्कार के मामलों को उजागर किया था. बाद में उनका अपहरण हुआ और उनकी हत्या कर दी गई. इस मामले में कई पुलिस अधिकारियों को दोषी ठहराया गया.

फिल्म लंबे समय तक सेंसर बोर्ड के साथ विवाद में फंसी रही. खबरें आईं कि CBFC ने 120-127 कट्स मांगे. नाम बदलवाया गया. घल्लुघारा से पंजाब-95 और फिर सतलुज पर बात बनी. कहा गया कि ‘बेस्ड ऑन ट्रू इवेंट्स’ टैग हटाओ, खालरा की पत्नी का नाम हटाओ, टॉर्चर सीन टोन डाउन करो. आखिर ZEE5 पर फिल्म अनकट रिलीज हुई, लेकिन भारत में तुरंत हटा दी गई.

Hun Ni Rukni Film Khalra Saab Di Avaaz Nu Koi Ni Dabaa Sakda 🪔 pic.twitter.com/sXsMvoPSK2

इस एक्शन के बाद सतलुज को लेकर विवाद और गहरा गया है. अकाली दल, एसजीपीसी और कई सिख संगठनों ने आरोप लगाया कि फिल्म को दबाया जा रहा है और पंजाब के इतिहास को सामने आने से रोका जा रहा है. दूसरी ओर कुछ राजनीतिक दलों ने इसे अभिव्यक्ति की आजादी का मामला बताया. यानी फिल्म एक बार फिर केवल सिनेमा नहीं रही, बल्कि राजनीतिक बहस का केंद्र बन गई.

यह कहना सही नहीं होगा कि कोई फिल्म अकेले चुनाव जिता या हरा सकती है. चुनाव हमेशा कई मुद्दों, सामाजिक समीकरणों, नेतृत्व और संगठनात्मक ताकत पर तय होते हैं. लेकिन यह भी सच है कि फिल्में चुनावी माहौल बनाने में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं.

किसी मुद्दे पर बनी फिल्म उस बहस को आम लोगों तक पहुंचा देती है. जो विषय पहले अखबारों और राजनीतिक भाषणों तक सीमित रहता है, वह अचानक घर-घर की चर्चा बन जाता है.

यही वजह है कि विवादित फिल्मों पर राजनीतिक दल तुरंत अपनी-अपनी स्थिति साफ करते हैं. कोई फिल्म का समर्थन करता है तो कोई विरोध. कोई सेंसरशिप का मुद्दा उठाता है तो कोई राज्य की छवि खराब होने की बात करता है. यानी फिल्म अपने आप में एक राजनीतिक प्रतीक बन जाती है.

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