'ऑफिस खत्म तो काम भी खत्म...' भारतीय ने बताया कनाडा का कल्चर
'ऑफिस खत्म तो काम भी खत्म...' भारतीय ने बताया कनाडा का कल्चर

विदेश में रहने वाले भारतीयों से अक्सर एक सवाल पूछा जाता है-अगर मौका मिले तो क्या आप भारत वापस आ जाएंगे? इस सवाल का जवाब हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकता है. कोई बेहतर करियर की बात करता है, कोई बच्चों की पढ़ाई की, तो कोई लाइफस्टाइल की.
इसी बीच कनाडा के हैलिफैक्स में रहने वाले भारतीय आईटी प्रोफेशनल रोहित गुप्ता का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. उन्होंने दावा किया कि विदेश में रहने की सबसे बड़ी वजह सिर्फ अच्छी सैलरी, साफ हवा या बेहतर सड़कें नहीं, बल्कि वर्क-लाइफ बैलेंस और कर्मचारियों के निजी समय का सम्मान है.
'20 साल भारत में रहे हैं, सिर्फ हवा-पानी के लिए कोई नहीं रुकता'
रोहित वीडियो में कहते हैं कि जो लोग अपनी जिंदगी के 20-25 साल भारत में बिता चुके हैं, वे सिर्फ साफ हवा या बेहतर पानी की वजह से विदेश में नहीं बस जाते.उनके मुताबिक, असली फर्क वहां के ऑफिस कल्चर में है, जहां कर्मचारी का निजी समय भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता है जितना उसका काम.
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रोहित के अनुसार, अगर ऑफिस का समय शाम 5 बजे तक है, तो 5 बजे के बाद सिर्फ बॉस को खुश करने के लिए बैठने की उम्मीद नहीं की जाती. वह कहते हैं कि कई बार मैनेजर खुद कर्मचारियों से पहले ऑफिस छोड़ देता है. वहां देर तक बैठना मेहनती होने की पहचान नहीं माना जाता.
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रोहित का कहना है कि भारत में कई कर्मचारी छुट्टी लेने से पहले रिप्लेसमेंट, नॉलेज ट्रांसफर (KT) और दूसरे इंतजामों को लेकर तनाव में रहते हैं.वहीं, उनके अनुभव के अनुसार कनाडा में कर्मचारी अगर बर्नआउट, परिवार से मिलने या यात्रा के लिए छुट्टी लेना चाहें, तो इस पर खुलकर बात कर सकते हैं. हालांकि, छुट्टी के नियम हर कंपनी की अपनी नीति पर निर्भर करते हैं.
वर्क-लाइफ बैलेंस का मतलब यह नहीं कि कम काम किया जाए. इसका मतलब है कि नौकरी और निजी जिंदगी के बीच ऐसा बैलेंस हो, जिससे एम्पलॉयी को परिवार, आराम, स्वास्थ्य और अपनी पसंद की एक्टिविटी के लिए भी वक्त मिल सके.एक्सपर्ट मानते हैं कि इससे लंबे वक्त में तनाव कम हो सकता है और प्रोडेक्टिविटी पर भी पॉजिटिव असर पड़ सकता है.
हाल के सालों में भारत की कई कंपनियों ने भी फ्लेक्सिबल वर्किंग, हाइब्रिड मॉडल, मेंटल हेल्थ सपोर्ट और एम्प्लॉयी वेलबीइंग जैसी नीतियों पर ध्यान बढ़ाया है. हालांकि, अलग-अलग कंपनियों, उद्योगों और टीमों में काम करने का अनुभव काफी अलग हो सकता है.
वीडियो वायरल होने के बाद हजारों लोगों ने अपनी राय दी.कई यूजर्स ने लिखा कि वे भी अपने ऑफिस में ऐसा वर्क कल्चर चाहते हैं. कुछ लोगों ने कहा कि देर तक ऑफिस में रुकना कई जगह आज भी सामान्य माना जाता है.
वहीं, कुछ यूजर्स ने यह भी लिखा कि भारत और कनाडा दोनों में सभी कंपनियों का अनुभव एक जैसा नहीं होता. कई भारतीय कंपनियां भी कर्मचारियों को बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस देने की दिशा में काम कर रही हैं.
कोविड-19 महामारी के बाद दुनिया भर में वर्क-लाइफ बैलेंस, रिमोट वर्क, हाइब्रिड ऑफिस, बर्नआउट और मानसिक स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर चर्चा बढ़ी है. ऐसे वक्त में रोहित गुप्ता का अनुभव लोगों के बीच इसलिए वायरल हो रहा है क्योंकि यह एक ऐसे विषय को छूता है, जिससे लाखों नौकरीपेशा लोग खुद को जोड़कर देखते हैं.
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