Climate Change: भारत में तपती रातें छीन रही हर व्यक्ति की सालाना 93 घंटे की नींद, रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

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Climate Change: भारत में तपती रातें छीन रही हर व्यक्ति की सालाना 93 घंटे की नींद, रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

17 जुलाई 2026 को 04:54 am बजे
Climate Change: भारत में तपती रातें छीन रही हर व्यक्ति की सालाना 93 घंटे की नींद, रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

Climate Change: भारत में तपती रातें छीन रही हर व्यक्ति की सालाना 93 घंटे की नींद, रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: Devesh Tripathi Updated Fri, 17 Jul 2026 04:54 AM IST
सार

क्लाइमेट सेंट्रल की रिपोर्ट बताती है कि बढ़ते रात्रिकालीन तापमान के कारण भारत में लोगों की नींद पर गंभीर असर पड़ रहा है। दक्षिण भारत और कई बड़े शहर इस समस्या से सबसे अधिक प्रभावित हैं, जहां हर व्यक्ति सालाना कई घंटे कम सो पा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार गर्म रातें शरीर को पर्याप्त आराम नहीं करने देतीं, जिससे हृदय रोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मानसिक तनाव और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ता है।

गर्मी छीन रही रातों की नींद - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स/ANI

विस्तार

दिन के बढ़ते तापमान के साथ अब रातों की गर्मी भी गंभीर स्वास्थ्य संकट बनती जा रही है। क्लाइमेट सेंट्रल की नई वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार, गर्म और उमस भरी रातों के कारण देश के कई हिस्सों में लोग हर साल दर्जनों घंटे की नींद गंवा रहे हैं। दक्षिण भारत इस समस्या का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि जलवायु परिवर्तन अब केवल मौसम का विषय नहीं रह गया, बल्कि यह लोगों की नींद, स्वास्थ्य और कार्यक्षमता को प्रभावित कर रहा है।


रिपोर्ट के मुताबिक पुडुचेरी के लोग वर्षभर में औसतन 92 घंटे की नींद खो रहे हैं। आंध्र प्रदेश में 88.6 घंटे और केरल में 88.3 घंटे की नींद का नुकसान दर्ज किया गया है। तमिलनाडु, कर्नाटक और तेलंगाना में भी स्थिति चिंताजनक है, जहां लगातार बढ़ती रात्रिकालीन गर्मी लोगों को पर्याप्त आराम नहीं करने दे रही। तमिलनाडु में हर व्यक्ति की लगभग 7.9 घंटे और कर्नाटक में 7.8 घंटे की अतिरिक्त नींद केवल बदलती जलवायु के कारण कम हो रही है।


बड़े शहरों में भी गर्म रातों का दिख रहा प्रभाव
बड़े शहरों में भी गर्म रातों का प्रभाव तेजी से बढ़ा है। चेन्नई इस सूची में सबसे ऊपर है, जहां एक व्यक्ति सालाना औसतन 93 घंटे तक कम सो पा रहा है। मुंबई में यह आंकड़ा 84 घंटे, कोलकाता में 80 घंटे और दिल्ली में 66 घंटे है। बंगलूरू में जलवायु परिवर्तन के कारण अतिरिक्त नींद की कमी सबसे अधिक दर्ज की गई है, जबकि हैदराबाद, अहमदाबाद और पुणे में भी इसका उल्लेखनीय प्रभाव सामने आया है। विशेषज्ञों का मानना है कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण और कंक्रीट के फैलाव ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है।


नींद की कमी से हो सकती है गंभीर बीमारियां
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि वयस्कों के लिए प्रतिदिन 7 से 9 घंटे की गुणवत्तापूर्ण नींद आवश्यक है। जब रात का तापमान अधिक रहता है तो शरीर दिनभर की गर्मी से उबर नहीं पाता और गहरी नींद लेने में कठिनाई होती है। लंबे समय तक ऐसी स्थिति बने रहने पर उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, स्ट्रोक, मधुमेह, मोटापा, मानसिक तनाव, अवसाद, याददाश्त में कमी तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। पर्याप्त नींद नहीं मिलने से कार्यक्षमता और निर्णय लेने की क्षमता भी प्रभावित होती है।

पांच दशकों में तेजी से बढ़ा खतरा
रिपोर्ट में भारत सहित दुनिया के 1,338 शहरों का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन के अनुसार 1970 के दशक की तुलना में जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली नींद की कमी लगभग दोगुनी हो चुकी है। वर्ष 2020 से 2025 के बीच दुनिया भर में प्रत्येक व्यक्ति ने औसतन 56 घंटे की नींद गर्म रातों के कारण खोई, जिसमें 10 प्रतिशत से अधिक कमी का संबंध सीधे जलवायु परिवर्तन से पाया गया। वैज्ञानिकों का कहना है कि जीवाश्म ईंधनों के बढ़ते उपयोग और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन ने तापमान में लगातार वृद्धि की है। यदि उत्सर्जन पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और गंभीर होगी।