Rafi Death Anniversary: बत्ती गुल हुई तो रौशन हुए ‘रफी’, दिलीप कुमार संग अभिनय भी किया; पढ़ें रोचक किस्से

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Rafi Death Anniversary: बत्ती गुल हुई तो रौशन हुए ‘रफी’, दिलीप कुमार संग अभिनय भी किया; पढ़ें रोचक किस्से

31 जुलाई 2026 को 08:11 am बजे
Rafi Death Anniversary: बत्ती गुल हुई तो रौशन हुए ‘रफी’, दिलीप कुमार संग अभिनय भी किया; पढ़ें रोचक किस्से

Rafi Death Anniversary: बत्ती गुल हुई तो रौशन हुए ‘रफी’, दिलीप कुमार संग अभिनय भी किया; पढ़ें रोचक किस्से

एंटरटेनमेंट डेस्क,अमर उजाला Published by: गोधूलि श्रीवास्तव Updated Fri, 31 Jul 2026 08:11 AM IST
सार

Mohammed Rafi 46th Death Anniversary: सुरों के सरताज मोहम्मद रफी की आज 46वीं पुण्यतिथि है। अपने 36 साल के करियर में रफी साहब ने 7 हजार से ज्यादा गाने गाए। देव आनंद से लेकर धर्मेंद्र और दिलीप कुमार से लेकर शम्मी कपूर तक की आवाज बने। आज इस खास मौके पर पढ़ें रफी साहब के जीवन से जुड़े कुछ अनसुने किस्से...

मोहम्मद रफी की 46वीं पुण्यतिथि पर विशेष - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

साल- 1937  


जगह- लाहौर (अब पाकिस्तान में) 
ऑल-इंडिया एक्जीबिशन में म्यूजिक कंपोजर श्याम सुंदर स्टेज पर उस दशक के सुपरस्टार केएल सहगल साहब को सुनने का इंतजार कर रहे थे। अचानक बिजली चली गई और बड़े भाई के अनुरोध पर एक 13 साल के लड़के को कुछ देर के लिए स्टेज पर गाने की इजाजत मिल गई।
उस अंधेरे में श्याम सुंदर के कानों में एक सुरीली आवाज पड़ी। जब तक बत्ती वापस आती संगीत रौशन हो चुका था। श्याम सुंदर ने देखा एक 13 साल का बच्चा स्टेज पर गाना गा रहा था। श्याम सुंदर की एक नजर ने ही उस बच्चे को आगे चलकर उसके करियर का पहला ब्रेक दिया। वो बच्चा कोई और नहीं, मोहम्मद रफी ही थे। 

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परिवार के साथ मोहम्मद रफी - फोटो : सोशल मीडिया

अमिताभ के फैन थे रफी, पतंग उड़ाने का ढूंढते थे मौका
आगे चलकर चार दशक के करियर में मोहम्मद रफी ने अपने गानों से संगीत प्रेमियों के कई शौक पूरे किए पर बात करें खुद रफी साहब की तो उन्हें गायकी के अलावा कई और शौक थे। लेखक विनोद विप्लव की किताब ‘मेरी आवाज सुनो’ में रफी के व्यक्तिगत जीवन के बारे में कई जानकारियां हैं।

  • मोहम्मद रफी को जितना शौक सुर साधने का था। उतना ही सुकून उन्हें पतंग के धागे थामने में भी मिलता था। जैसे ही उन्हें रिकार्डिंग से ब्रेक मिलता था पतंग लेकर छत पर चढ़ जाते थे।
  • रफी साहब को फिल्में देखने का ज्यादा शौक नहीं था। मगर फिल्म ‘शोले’ एकमात्र ऐसी फिल्म थी, जिसे उन्होंने तीन बार थिएटर में जाकर देखा। 
  • वो अमिताभ बच्चन के बड़े फैन थे। उन्होंने बच्चन साहब की फिल्म ‘दीवार’ जब पहली बार देखी तभी से वो उनके अभिनय के मुरीद हाे गए। पहली बार जब उन्हें अमिताभ बच्चन के साथ स्टेज पर गाना गाने का अवसर मिला था तब वह बेहद खुश हुए थे। 
  • बेटे शाहिद रफी बताते हैं, 'रफी साहब के कच्चा दूध बहुत पसंद था। दूधवाला जब दूध की बोतलें लेकर घर पहुंचता तो रफी साहब कच्चा दूध ही पी जाते थे।'

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फिल्म 'जुगनू' और 'लैला मजनू' के एक सीन में मोहम्मद रफी - फोटो : सोशल मीडिया

दिलीप कुमार के साथ अभिनय किया
कम ही लोग जानते हैं कि रफी साहब ने कभी कैमरे के साथ भी प्रयोग किया है। 1945 में रिलीज हुई फिल्म ‘लैला मजनू’ में उन्होंने पहली बार ऑनस्क्रीन गाना गाया था। इसके अलावा 1947 में  रिलीज हुई फिल्म ‘जुगनू’ में तो उन्होंने बाकायदा अभिनय किया था। इस फिल्म में दिलीप कुमार लीड रोल में थे। फिल्म में रफी साहब ने एक कॉलेज छात्र का किरदार निभाया था।

तलत महमूद को देखकर छोड़ा अभिनय
हालांकि, इन दो फिल्मों के बाद उन्होंने अभिनय से दूरी बना ली। इसकी वजह बताते हुए एक पुराने इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, ‘तलत महमूद को देखिए। उन्होंने गायक होकर अभिनेता बनने की कोशिश की। इसके बाद ना तो वे अभिनय में चल पाए और गायकी में हाथ से चली गई। स्वर्गीय मुकेश भाई ने निर्माता बनने की सोची और जब उनकी फिल्म फ्लॉप हुई तो उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा। मेरी अभिनेता बनने की कोई इच्छा नहीं, मैं गायक ही बेहतर हूं।'

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गायक मोहम्मद रफी - फोटो : सोशल मीडिया

छिपकर दिया गैर फिल्मी एल्बम में संगीत 
मोहम्मद रफी के बेटे शाहिद रफी ने अपने पिता की बात करते हुए एक बेहद खास किस्सा सुनाया था। उन्होंने कहा, ‘अब्बा ने कभी संगीतकार बनने की कोशिश नहीं की। वह हमेशा कहते थे कि इंसान के एक ही चीज में माहिर होना चाहिए। हालांकि उन्हें म्यूजिक कंपोज करने के लिए कई बार पेशकश की गई। मगर उन्होंने कहा कि ‘अगर मैंने संंगीत बनाया तो बाकि संगीतकारों को लगेगा मैं उनका काम छीन रहा हूं। हो सकता है इससे वह मुझे गाने देना ही बंद कर दें।’ उन्होंने कई गैर फिल्मी गानों के लिए संगीत दिया, मगर अपने नाम से नहीं। उनके संगीतबद्ध किए हुए एल्बम काफी हिट हुए पर रफी साहब ने कभी उन्हें अपना नाम नहीं दिया।'

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मोहम्मद रफी , गीता दत्त - फोटो : सोशल मीडिया

रफी के अनसुने किस्से 

  • रफी साहब मोहर्रम के दिन रिकॉर्डिंग नहीं करते थे। साल का यही एक ऐसा खास दिन होता जिस दिन वह गाना नहीं गाते।
  • हिंदी सिनेमा का सबसे पहला ‘रॉक एन रोल’ कैटेगरी गाना ‘जान पहचान हो’ रफी साहब ने ही गाया था। यह गाना फिल्म ‘गुमनाम’ (1965) के लिए रिकॉर्ड किया गया था।
  • रफी ने पूरे जीवन ने सिर्फ दो ही बार विदेश यात्रा की। पहली बार 1971 में वह 8 महीने के लिए और दूसरी बार 1973 में चार माह के लिए विदेश गए थे। इससे भारत में उनके काम पर असर पड़ने लगा तो उन्हें गाने मिलने कम हो गए। 
  • रफी साहब ने निधन से एक दिन पहले अपना आखिरी गाना 'तू कहीं आस पास है दोस्त' रिकॉर्ड किया था। यह धर्मेंद्र और हेमा मालिनी की फिल्म ‘आस-पास’ के लिए रिकॉर्ड किया गया था।
  • रफी साहब कभी औरतों को मर्दों से कम नहीं समझते थे। उन्होंने अपनी पत्नी बिलकिस बानो को जरी एवं कढ़ाई का करोबार शुरू करने में मदद की थी। इसके चलते उनके निधन के बाद भी उनकी पत्नी को किसी आर्थिक सहारे की जरुरत नहीं पड़ी।
  • यूं तो रफी साहब का दावा था कि उन्होंने अपने करियर में करीब 28 हजार गाने रिकॉर्ड किए हैं पर ऑफिशियली उनके नाम पर 7,400 गाने ही पाए जाते हैं।

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मोहम्मद रफी, अशोक कुमार, दिलीप कुमार, टीना मुनीम - फोटो : सोशल मीडिया

कई सुपरस्टार्स की पहली आवाज बने रफी  
मोहम्मद रफी ने कई संगीतकारों के करियर का पहला गाना गाया था। इसमें मदन मोहन, आर डी बर्मन, रोशन, शंकर-जयकिशन और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसे लीजेंड शामिल हैं। वहीं अभिनय की दुनिया के कई भावी सितारों का फिल्मी डेब्यू भी रफी साहब की आवाज से हुआ। इस फेहरिस्त में अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना, धर्मेंद्र, गुरू दत्त, जॉनी वॉकर, राजकुमार और शत्रुघन सिन्हा जैसे दिग्गज कलाकार शामिल थे। इसके अलावा रफी साहब ने सबसे ज्यादा गाने शम्मी कपूर के लिए रिकॉर्ड किए। 



इन कलाकरों के लिए रफी ने गाए इतने गाने 

  • शम्मी कपूर - 190 गाने
  • जॉन वॉकर - 145 गाने
  • शशि कपूर - 129 गाने
  • धर्मेंद्र - 114 गाने
  • देव आनंद - 100 गाने   
  • सुनील दत्त - 79 गाने
  • दिलीप कुमार - 77 गाने

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मोहम्मद रफी, आशा भोसले, लता मंगेशकर - फोटो : सोशल मीडिया

'मेरे पिता से जलती थीं लता और आशा जी'
कुछ महीनों पहले विक्की लालवानी को दिए एक इंटरव्यू में मोहम्मद रफी के बेटे शाहिद रफी ने कई खुलासे किए थे। शाहिद ने कहा था, ‘लता मंगेशकर और आशा भोसले इस बात से ईर्ष्या करती थीं कि मेरे पिता रफी साहब उनसे ऊपर थे। वे चाहती थीं कि सब उनके नीचे रहें। लोग अगर रफी साहब के नंबर वन कहते थे तो उन्हें यह पसंद नहीं था। वो मेरे पिता से जलती थीं।' 
इस इंटरव्यू में शाहिद रफी ने 'स्वर सम्राज्ञी' लता मंगेशकर और उनकी बहन आशा भोसले पर सीधे तौर पर ईर्ष्या और असुरक्षा के कारण रफी का करियर बर्बाद करने का आरोप लगाया था। रफी साहब का नाम जो कभी विवादों में नहीं रहा, उनकी मौत के कई साल बाद घसीटा गया।

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मोहम्मद रफी, किशोर कुमार - फोटो : सोशल मीडिया

किशोर कुमार से नहीं थी बराबरी 
गायक किशोर कुमार और मोहम्मद रफी की प्रतिद्वंदिता की फैंस के बीच अक्सर बातें होती रहती थीं। 1970 में रिलीज हुई फिल्म ‘अराधना’ से किशोर कुमार का करियर आसमान छू गया। इसके बाद अफवाह फैली कि मोहम्मद रफी का करियर किशोर दा ने खत्म कर दिया।
दोनों में गानों के लेकर जबरदस्त कॉम्पिटीशन चल रहा है। मगर यह सब गलत निकला। शाहिद रफी के मुताबिक किशोर और रफी का रिश्ता भाइयों जैसा था।

 

 

 

 

 

 

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रफी साहब के जनाजे में शामिल हुए अमजद खान, अभिताभ बच्चन और यश चोपड़ा - फोटो : X

वो दिन जिसने एक साथ लाखों लोगों को रुलाया
और फिर 31 जुलाई 1980 का वो काला दिन भी आ गया जब शहंशाह-ए-तरन्नुम अपने फैंस और चाहने वालों को हमेशा के लिए छोड़कर चले गए। सुबह 9 बजे तक वो एक बंगाली गीत की रिहर्सल कर रहे थे। उसी समय उन्हें सीने में दर्द हुआ। उन्हें लगा गैस है मगर वो हार्ट अटैक निकला। अस्पताल ले जाकर भी रफी साहब को बचाया नहीं जा सका।
मोहम्मद रफी दुनिया छोड़ कर चले गए। इसके साथ ही छोड़ गए एक लंबी विरासत। रफी के सदाबहार गीत,अनमोल यादें। रफी साहब के जनाजे में ऐसा लगा मानों पूरा मुंबई सड़कों पर उतर आया हो। उनके जनाजे में करीब 10 हजार लोग शामिल हुए थे।

जनाजे तक ही साथ रही फिल्मी दुनिया 
मोहम्मद रफी की मौत के बाद पीछे रह गए उनकी पत्नी बिलकिस बानो और सात बच्चे। एक इंटरव्यू में उनकी पत्नी ने बताया कि जब तक रफी साहब थे। फिल्मी दुनिया के लोग भी आते-जाते रहते थे। मगर उनकी मौत के बाद सबने आना छोड़ दिया। पति की मौत के बाद बिलकिस बानो ने अपना करोबार संभाला।