अल-नीनो बढ़ाएगा अधिक गर्मी और बेतरतीब मौसम, WMO ने दी चेतावनी

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अल-नीनो बढ़ाएगा अधिक गर्मी और बेतरतीब मौसम, WMO ने दी चेतावनी

06 जुलाई 2026 को 09:41 am बजे
अल-नीनो बढ़ाएगा अधिक गर्मी और बेतरतीब मौसम, WMO ने दी चेतावनी

अल-नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है. आमतौर पर हर दो से सात साल में यह होता है. सामान्य स्थिति में पूर्वी प्रशांत से पश्चिम की ओर हवाएं चलती हैं, जो गर्म पानी को इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया की तरफ ले जाती हैं.

जब अल-नीनो आता है तो ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं या उल्टी दिशा में चलने लगती हैं. इससे समुद्र की सतह का तापमान 2 डिग्री सेल्सियस या उससे ज्यादा बढ़ सकता है. WMO के अनुसार, 2026 में यह तेजी से मजबूत हो रहा है. जुलाई-सितंबर तक मजबूत अल-नीनो बनने की संभावना बहुत ज्यादा है.

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यह घटना सिर्फ समुद्र तक सीमित नहीं रहती. यह पूरी दुनिया की हवा के रुख, बारिश के पैटर्न और तापमान को बदल देती है. अल-नीनो के दौरान गर्म पानी वातावरण में ज्यादा गर्मी छोड़ता है, जिससे वैश्विक तापमान और बढ़ जाता है. मौजूदा जलवायु परिवर्तन के साथ यह और खतरनाक हो सकता है.

अल-नीनो के मजबूत होने से कई क्षेत्रों में चरम मौसम बढ़ेगा. WMO की रिपोर्ट के मुताबिक, सूखा और भारी बारिश दोनों की संभावना बढ़ जाएगी. प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में भारी बारिश हो सकती है, जबकि भारत उपमहाद्वीप, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, उत्तरी दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में कम बारिश या सूखे की आशंका है. दक्षिणी अफ्रीका में ज्यादा बारिश और उत्तरी भागों में सूखा हो सकता है.

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भारत में मानसून कमजोर पड़ने की संभावना रहती है. अल-नीनो वर्षों में अक्सर कम बारिश होती है, जिससे कृषि प्रभावित होती है. हीटवेव बढ़ सकती हैं, जिससे स्वास्थ्य समस्याएं जैसे हीट स्ट्रोक, पानी की कमी और बीमारियां बढ़ेंगी. समुद्री गर्मी की लहरें भी बढ़ेंगी, जो मछली पकड़ने और समुद्री जीवन को नुकसान पहुंचाएंगी.

कृषि पर सबसे बड़ा खतरा है. FAO के अनुसार, दक्षिणी अफ्रीका, मध्य अमेरिका, दक्षिण एशिया और साहेल क्षेत्र में सूखे से फसलें और चरागाह प्रभावित होंगे. 2015-16 के अल-नीनो में लाखों लोग भुखमरी की कगार पर पहुंच गए थे. इस बार अगर सुपर अल-नीनो बना तो अनाज उत्पादन घट सकता है, कीमतें बढ़ेंगी और खाद्य सुरक्षा चुनौती बनेगी. पशुपालन, पानी की उपलब्धता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होगी.

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भारत में अल-नीनो का सीधा संबंध मानसून से है. कमजोर मानसून से खरीफ फसलें जैसे धान, मक्का, सोयाबीन प्रभावित हो सकती हैं. सूखे से जलाशयों में पानी कम होगा, सिंचाई मुश्किल होगी और बिजली उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है. गर्मी बढ़ने से स्वास्थ्य सेवाओं पर बोझ बढ़ेगा, खासकर बुजुर्गों, बच्चों और मजदूरों पर.

शहरों में अर्बन हीट आइलैंड के साथ लू और भी खतरनाक हो जाएगी. ग्रामीण क्षेत्रों में किसान पहले से ही जलवायु परिवर्तन से जूझ रहे हैं, अल-नीनो अतिरिक्त झटका देगा. हालांकि, हर अल-नीनो एक समान नहीं होता. कुछ मामलों में भारी बारिश के क्षेत्रीय प्रभाव भी देखे गए हैं, लेकिन कुल मिलाकर सूखे की आशंका ज्यादा रहती है.

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WMO की महासचिव सेलेस्टे साउलो ने कहा कि अल-नीनो पहले से शुरू हो चुका है और तेजी से मजबूत होगा. उन्होंने UN और क्षेत्रीय स्तर पर समन्वय बढ़ाने की बात कही है. मौसमी पूर्वानुमान, जलवायु सूचना सेवाएं और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियां जान बचाने और अर्थव्यवस्था को नुकसान कम करने में मदद करेंगी.

सरकारों, मानवीय संगठनों, कृषि और स्वास्थ्य क्षेत्र को तैयार रहना चाहिए. भारत में IMD, कृषि विभाग और आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को सक्रिय होना चाहिए. फसल बीमा, जल संरक्षण, सूखा-प्रतिरोधी बीज और बेहतर पूर्वानुमान का इस्तेमाल महत्वपूर्ण होगा.

अल-नीनो प्राकृतिक है, लेकिन मानव-जनित जलवायु परिवर्तन इसे और तीव्र बना रहा है. गर्म होता समुद्र और वातावरण अल-नीनो के प्रभाव को बढ़ा देते हैं. भविष्य में ऐसे घटनाओं की तीव्रता और आवृत्ति बढ़ सकती है. इसलिए दीर्घकालिक अनुकूलन जरूरी है.

अल-नीनो 2026 एक चेतावनी है. WMO के ग्लोबल सीजनल क्लाइमेट अपडेट में अन्य कारकों जैसे इंडियन ओशन डाइपोल और अटलांटिक स्थितियों को भी ध्यान में रखा गया है. अगर हम समन्वित तरीके से तैयार होते हैं तो नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है. किसानों, नीति-निर्माताओं और आम लोगों को जागरूकता और कार्रवाई की जरूरत है.

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