डोभाल चीन के साथ रिश्तों को रिसेट करने की कोशिश में, क्या बदलेगा इतिहास?
डोभाल चीन के साथ रिश्तों को रिसेट करने की कोशिश में, क्या बदलेगा इतिहास?

दुनिया इस समय सिर्फ एक जंग नहीं देख रही, बल्कि एक बड़ी उथल-पुथल से गुजर रही है, जिसमें पुरानी दोस्तियों के समीकरण बदल रहे हैं और नए रिश्ते बन रहे हैं. ईरान युद्ध ने तेल, शिपिंग और महंगाई पर सीधा असर डाला है. रूस-यूक्रेन युद्ध ने यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था बदल दी है और अमेरिका-चीन की टक्कर अब व्यापार से निकलकर टेक्नोलॉजी और ताकत तक फैल चुकी है.
इसी बदलाव के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल का बीजिंग दौरा सिर्फ सीमा वार्ता नहीं, बल्कि इस बड़ी तस्वीर का हिस्सा है, जिसमें अमेरिका, चीन, रूस और भारत अपनी-अपनी जगह फिर से तय कर रहे हैं.
डोभाल ने चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ 25वें दौर की स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव वार्ता की. दोनों पक्षों ने सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने, सीमा तय करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने और रिश्तों में बनी सकारात्मक रफ्तार जारी रखने पर जोर दिया.
चीन ने भी इस बातचीत को गहरी और साफ बताया और भारत-चीन रिश्तों के वैश्विक महत्व को रेखांकित किया. लेकिन इस मुलाकात का मतलब सिर्फ इतना नहीं कि दोनों देशों ने फिर बात की. बड़ा सवाल यह है कि ऐसे समय में जब पूरी दुनिया की राजनीति बदल रही है, तब भारत और चीन बातचीत क्यों तेज कर रहे हैं.
2020 का गलवान संघर्ष भारत-चीन रिश्तों के लिए सबसे कठिन दौर था. सीमा पर सैनिकों का आमने-सामने डटे रहना, व्यापार में तनाव और राजनीतिक अविश्वास ने रिश्तों को लगभग रोक दिया था. अब धीरे-धीरे तस्वीर बदल रही है.
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सीमा पर सेनाएं पीछे हटने के बाद बड़े स्तर की बातचीत फिर शुरू हुई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकातों के बाद रिश्तों को पटरी पर लाने की कोशिश तेज हुई और अब डोभाल-वांग वार्ता उसी प्रक्रिया का अगला कदम है.
दोनों देश करीब 3,800 किलोमीटर लंबी विवादित सीमा का राजनीतिक हल निकालने की बातचीत जारी रखने पर सहमत हैं. लेकिन इसे दोस्ती कहना जल्दबाजी होगी, क्योंकि सीमा विवाद अब भी कायम है और दोनों देशों के बीच कई मुद्दों पर हित टकराते हैं. इसलिए फिलहाल नॉर्मलसी का मतलब दोस्ती नहीं, बल्कि आपसी टकराव को संभालकर रखने की कोशिश ज्यादा है.
डोभाल की यह यात्रा ऐसे समय हो रही है जब अमेरिका और चीन की टक्कर दुनिया की सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्विता बन चुकी है. इसी बीच ईरान युद्ध ने दुनिया के तेल बाजार को भी झटका दिया है.
मिडिल ईस्ट के सप्लाई रूट में रुकावट से तेल और शिपिंग की लागत बढ़ी है. रिपोर्टों के मुताबिक अगस्त 2026 तक दुनिया के करीब 43 प्रतिशत तेल उत्पादन ऐसे देशों से आ रहा है जो किसी न किसी संघर्ष में उलझे हैं.
इसका मतलब है कि ईरान की लड़ाई अब सिर्फ तेहरान और वॉशिंगटन तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसका असर चीन, रूस, भारत, यूरोप और आम उपभोक्ताओं तक पहुंच रहा है. अमेरिका ने ईरान पर नए प्रतिबंध भी लगाए हैं, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि इनमें चीन से जुड़े कुछ वित्तीय संस्थानों को निशाना नहीं बनाया गया, जबकि चीन ईरानी तेल व्यापार में बड़ा हिस्सेदार है.
अमेरिका से परेशान चीन, दबाव में रूस और बीच में भारत
चीन के सामने अमेरिका के साथ व्यापार और टेक्नोलॉजी को लेकर टकराव है. रूस पश्चिमी प्रतिबंधों और यूक्रेन युद्ध के दबाव में है. ईरान अमेरिकी दबाव और जंग के बीच फंसा है. इन तीनों देशों के लिए भारत एक अहम साझेदार है, लेकिन तीनों के लिए भारत की भूमिका अलग है.
चीन के लिए भारत एक प्रतिस्पर्धी भी है और बड़ा बाजार भी. रूस के लिए भारत दशकों पुराना और भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार है, जो रक्षा, ऊर्जा और कूटनीति में जुड़ा हुआ है. पश्चिमी दबाव के बावजूद रूस भारत के साथ अपने रिश्ते बनाए रखने की कोशिश कर रहा है और पुतिन की संभावित भारत यात्रा तथा ब्रिक्स में उनकी मौजूदगी इसी कोशिश का हिस्सा मानी जा रही है.
लेकिन भारत की रणनीति रूस या चीन के साथ किसी अमेरिका विरोधी गुट में शामिल होना नहीं है. भारत की कोशिश है कि वह किसी एक शक्ति पर निर्भर हुए बिना अपने पास कई विकल्प खुले रखे.
डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों से क्या नया समीकरण बन रहा है
डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ और प्रतिबंध वाली विदेश नीति ने यह साफ कर दिया है कि अमेरिका अपनी आर्थिक ताकत को कूटनीतिक दबाव के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है. लेकिन इसका एक और असर भी दिख रहा है.
अमेरिकी दबाव से परेशान कई देश अब वैकल्पिक व्यापार और साझेदारी के रास्ते तलाश रहे हैं. चीन, रूस, ईरान और कई विकासशील देशों के बीच बढ़ता संपर्क इसी बदलाव का हिस्सा है. इसका मतलब यह नहीं कि अमेरिका की ताकत खत्म हो गई है, लेकिन दुनिया में एक ही शक्ति के दबदबे पर सवाल जरूर बढ़ रहे हैं.
सितंबर में भारत ब्रिक्स सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है और शी जिनपिंग के दिल्ली आने की संभावना है, जो करीब सात साल में उनकी पहली भारत यात्रा हो सकती है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है.
अगर शी दिल्ली आते हैं और पुतिन भी ब्रिक्स में शामिल होते हैं, तो एक ही मंच पर भारत, चीन और रूस एक साथ नजर आएंगे. इसे अमेरिका विरोधी गठबंधन कहना गलत होगा, क्योंकि ब्रिक्स के भीतर भी देशों के हित अलग-अलग हैं.
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