ओडिसी... नोलन के अहंकार की महागाथा!
ओडिसी... नोलन के अहंकार की महागाथा!

‘महान होना वरदान है, लेकिन यह जान जाना कि आप महान हैं, अभिशाप है.’
-यह मेरे ‘क्रुंग थेप महा नाखोन ओडिसी’ से निकला एक विचार
है. (क्रुंग थेप महा नाखोन थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक का थाई भाषा में आधिकारिक और संक्षिप्त नाम है. इसका अर्थ है ‘देवदूतों का महानगर’.)
मैं स्तुति वाला हिस्सा छोड़ रहा हूं. आप उसे पहले ही पढ़ चुके हैं- हर उस पब्लिकेशन में जिसका डॉट कॉम वाला पता है. वही पैराग्राफ, जिसमें बताया गया है कि क्रिस्टोफर नोलन ने फैन फॉलोइंग में जेम्स कैमरन और स्टीवन स्पीलबर्ग को पीछे छोड़ दिया है. कि वह सिर्फ आपकी आंखों में आंसू नहीं लाते, दिमाग से भी खेलते हैं. और यह कि आखिरकार पश्चिमी सभ्यता की सबसे पुरानी महागाथाओं में से एक को वह बड़ा सिनेमाई ट्रीटमेंट मिल गया, जिसकी वह हकदार थी.
मैं उन तगड़े रोस्ट और मजाक उड़ाने वाले हमलों को भी छोड़ रहा हूं, जो एलन मस्क वाले धड़े की तरफ से आए- खासकर इस बात पर कि हेलेन गोरी क्यों नहीं है. और वे मीम भी छोड़ देता हूं जिनमें लोग फिल्म को वैसे नहीं देख रहे, जैसे नोलन चाहते थे. ये सब बहुत हो चुका. मेरी दिलचस्पी अब उस चीज में है जो बची है- एक ऐसे जीनियस में, जिसे पता है कि वह जीनियस है और जो सबके सामने लड़खड़ा रहा है, लेकिन अपने लड़खड़ाने को भी विजन बताने पर अड़ा हुआ है. बस, मेरी असहमति के असली मुद्दे ये हैं.
पहले फिल्म की बात करते हैं. आखिर कंटेंट ही राजा है और नोलन हॉलीवुड के मौजूदा राजघराने के सबसे बड़े नामों में हैं. होमर की ‘ओडिसी’ पर बनी यह फिल्म नोलन की अपनी सिनेमाई भाषा में सुनाई गई कहानी है. और सीधी बात यह है कि फिल्म उम्मीद से कमतर है. सिर्फ इसलिए नहीं कि वह हाइप और उम्मीदों के बोझ तले दब गई है. अपने दम पर भी यह फिल्म कमजोर है. जब विराट कोहली कम रन बनाते हैं तो निराशा होती है. संदीप सिंह वही करें तो उतनी नहीं होती. नोलन ने कई साल पहले अपनी ही कसौटी इतनी ऊंची कर दी थी कि अब उन्हें उसी के पार जाना है.
‘ओडिसी’ को फिल्म में ढालना आसान काम नहीं है. यह ऐसी महागाथा है जो इंसान के चरित्र को खोलती है. उसकी जड़ें ग्रीक हैं, लेकिन उसमें जो बातें हैं, वे किसी एक देश की नहीं. वे दुनिया के हर समाज में समझी जा सकती हैं. इसीलिए सिर्फ दुस्साहसी फिल्ममेकर ही इसे फिर से बनाने की कोशिश करता है. मुझे तथाकथित ‘वोक’ बदलावों से कोई शिकायत नहीं है. हेलेन की भूमिका बदलना हो, एथेना की कास्टिंग बदलना हो, यूरिलोकस का किरदार किसी भारतीय अभिनेता को देना हो या किसी जापानी आदमी को सायरन के जाल में फंसते दिखाना हो- एक निर्देशक कहानी की आत्मा को बरकरार रखते हुए उसका खोल बदल सकता है. इसलिए मेरी समस्या वोकिज्म नहीं है.
मेरी समस्या यह है कि नोलन ने इतने शानदार कलाकारों के बावजूद अपने मुख्य किरदारों को भीतर से खोखला कर दिया. और जिस नतीजे के लिए इन कलाकारों से इतना कुछ करवाया गया, उसका भी हांसिल कुछ खास नहीं. मैट डेमन का वजन करीब 86 किलो से घटाकर 76 किलो किया गया. उन्होंने ग्लूटेन छोड़ दिया. वाइकिंग वाले शिप चलाना सीखा. खुले भूमध्यसागर में सचमुच बीमार हुए और उन्होंने जहाज के किनारों पर झुककर वाकई में उल्टी की. सिसिली में रोज पहाड़ी पर बने किले तक पैदल गए. फिर आइसलैंड की उजली रातों में हेड्स वाला सीक्वेंस शूट करते हुए सच में पूरी तरह भीगे रहे. और इन सबके बाद पर्दे पर जो ओडेसियस मिलता है, वह बस उदास और बोझिल आदमी है. उस चालाक, धूर्त और हर रास्ते का हल निकाल लेने वाले ओडेसियस से बहुत दूर, जिसे हम महागाथा में जानते हैं.
जरा उस उदासी को ध्यान से देखिए. यहीं असली धोखा छिपा है. डेमन का ओडेसियस अपराधबोध में डूबा हुआ आदमी है. ट्रॉय में हुए कत्लेआम का बोझ वह ऐसे ढो रहा है जैसे कोई ईसाई अपने कंधे पर क्रॉस ढोता है और उसे उतार नहीं सकता. यह गलत विचार को निभाने वाला शानदार अभिनय है. होमर का ओडेसियस ऐसा आदमी नहीं था. वह पोलिट्रोपोस था- कई रास्ते जानने वाला, चालाक, हर मोड़ पर नया रास्ता निकालने वाला आदमी. उसके लिए तरीका उतना महत्वपूर्ण नहीं था, जब तक अंत में वह अपने घर लौट सके.
ट्रॉय एक काम था. लकड़ी का घोड़ा एक चाल थी. काम खत्म हुआ और वह घर के लिए निकल पड़ा. रातों की नींद उड़ाने वाला अपराधबोध उसके हिस्से में नहीं था. यही उसकी असली खूबी थी- उसकी नैतिक चालाकी, उसकी धूर्तता. नोलन ने उस आत्मा को निकालकर उसकी जगह पछतावा रख दिया है. क्योंकि पछतावा देखने में गहराई जैसा लगता है. लेकिन वह गहराई नहीं है. वह बस ऐसा आदमी दिखता है जो कहीं और होना चाहता है. और फिल्म की लंबाई देखते-देखते दर्शक भी यही महसूस करने लगता है.
आर्गोस को ही लीजिए. वह बूढ़ा कुत्ता, जो युद्ध और सालों भटकने के बाद भी सिर्फ इसलिए इंतजार करता है कि एक दिन अपने मालिक को पहचान सके, सिर उठाए और फिर मर जाए. होमर को उस कुत्ते के लिए सिर्फ चार लाइनें चाहिए थीं. लेकिन उन चार लाइनों से वह आपका दिल तोड़ देता है. नोलन आर्गोस को फिल्म में लाते हैं. उस पल के लिए माहौल बनाते हैं. आपको उस भावुक क्षण का इंतजार करवाते हैं और फिर... कुछ नहीं. वह पल आता ही नहीं.
आप बैठे इंतजार करते हैं कि अब कुछ होगा. लेकिन कुछ नहीं होता. और आप सोचते हैं- ऐसा क्यों? क्या तीन घंटे की फिल्म में एडिटिंग के दौरान वह हिस्सा कट गया? ह्यूब्रिस? यानी अपनी महानता का अहंकार? या फिर वह एक जवाब जो इस पूरी फिल्म को चुपचाप समझा देता है- मैं नोलन हूं. मुझे कुछ समझाने की जरूरत नहीं. यह वाक्य फिल्म के हर फ्रेम के नीचे ऐसे बजता रहता है जैसे कोई तानपुरा, जिसे एक बार सुन लेने के बाद आप अनसुना नहीं कर सकते. मैं नोलन हूं. कुत्ते के उस पल को छोड़ सकता हूं. मैं नोलन हूं. चालाक ओडेसियस को उदास बना सकता हूं. मैं नोलन हूं. बाकी खाली जगहें आप खुद भरिए, क्योंकि मैंने तय कर लिया है कि खाली जगह ही आर्ट है.
याद रखने वाली बात यहां है. नोलन के सिनेमा में इंसानियत, उसकी असली गर्माहट, तब आई जब वे उसे उन जगहों में छिपाकर लाते हैं जहां उसकी कोई जरूरत नहीं लगती. एक सपने में डाली गई डकैती में. ब्लैक होल के भीतर. रिलेटिविटी की दरारों में. उन्होंने विज्ञान को महसूस करवाया था. वही उनकी महानता थी. अब जब महानता पर मुहर लग चुकी है और वह खुद एक ट्रेंड बन चुकी है, तो उन्होंने उसे चुपचाप फिल्म में घुसाना बंद कर दिया है. अब वह उसका ऐलान करते हैं. किसी कलाकार को बार-बार यह बताया जाए कि वह महान है तो एक समय के बाद वह वही चीज छोड़ देता है जिसने उसे महान बनाया था. क्योंकि वह चीज थी- दर्शक के साथ उदार होना. और जब आपको लगने लगे कि दर्शक आपकी महानता देखकर विस्मित होने के लिए बाध्य है, तो उदार रहना मुश्किल हो जाता है.
याद रखिए, होमर का ओडेसियस हो या नोलन का, दोनों इंसान हैं. फर्क असलियत का है. नोलन का इसके साथ एक इतिहास भी है. उन्होंने ‘द मशीनिस्ट’ में 54 किलो के कंकाल नुमा दिख रहे क्रिश्चियन बेल को सिर्फ पांच महीने में 100 किलो के बैटमैन में बदल दिया. रोज करीब 6,000 कैलोरी खिलाईं. फिर कहा कि 14 किलो वजन घटाओ क्योंकि बैटमैन का सूट फिट नहीं आ रहा. माफ कीजिए, अहंकार नहीं- फ्रेम फिट नहीं आ रहा था.
उन्होंने टॉम हार्डी को बैन का इतना तंग मास्क पहना दिया कि हार्डी ने खुद उसे क्लॉस्ट्रोफोबिक बताया. पहले ट्रेलर में उसकी आवाज इतनी दब गई कि डायलॉग समझ में ही नहीं आए. फिल्म रिलीज होने के बाद इसका पता चला और फिर बाद में आवाज ठीक करनी पड़ी. उन्होंने ‘ओपेनहाइमर’ के लिए सिलियन मर्फी को महीनों तक रोज एक बादाम ही खाने के लिए दी ताकि उनकी आंखों में वह पीछा किए जाने वाला भाव आ सके. नोलन शायद सचमुच मानते हैं कि पर्दे पर सच्चाई पैदा करने के लिए कलाकार को तकलीफ से गुजरना जरूरी है. ‘ओडिसी’ की दिक्कत यह है कि इस बार इस सारी तकलीफ से एक परेशान आदमी नहीं, एक बुझा हुआ आदमी पैदा हुआ है.
टॉम हॉलैंड का टेलीमेकस भी अपनी पूरी क्षमता के बावजूद बर्बाद हो जाता है. जेंडाया एथेना बनी हैं. मुझे ग्रीक देवी के रूप-रंग को बदलने से कोई परेशानी नहीं है. लेकिन एथेना की संगमरमर की मूर्तियों को देखते आए हम जिस आकृति की कल्पना करते हैं, वह यहां नहीं मिलती. हिमेश पटेल का यूरिलोकस शायद इकलौता किरदार है जिसे कुछ हद तक मांस-मज्जा मिली है. कुछ हद तक. बाकी लगभग सभी किरदार सतही हैं. इसमें वे वर भी शामिल हैं जो पेनिलोपी के आसपास मंडराते हैं. वे इतने खतरनाक नहीं बन पाते कि अंत में उनका कत्लेआम कोई जस्टिस जैसा लगे. इसलिए क्लाइमेक्स में जो होना चाहिए था, वह क्लाइमेक्स जैसा लगता ही नहीं.
और इनके पीछे कलाकारों की ऐसी लंबी सूची है, जैसे किसी अवॉर्ड सीजन की ड्रीम टीम हो, लेकिन ज्यादातर कलाकार ग्रीनरूम के बाहर अपनी बारी का इंतजार करते रह जाते हैं. ऐन हैथवे की पेनिलोपी- वह किरदार जिसे पूरी कविता को अपनी धैर्य की ताकत से संभालकर रखना है- उसे हैंडलूम और एक दूर तकती नजर से ज्यादा कुछ नहीं मिलता. लुपिता न्योंगो हेलेन ऑफ ट्रॉय और क्लाइटेमनेस्ट्रा, दोनों बनी हैं. कागज पर यह डबल कास्टिंग कमाल की लगती है.
एक ही युद्ध से तबाह हुई दो औरतों के चेहरे एक ही होना कितना दिलचस्प आइडिया है. लेकिन फिल्म दोनों को इतना कम समय देती है कि इस विचार की समझदारी साबित ही नहीं हो पाती. चार्लीज थेरॉन कैलिप्सो बनी हैं. सामंथा मॉर्टन सर्सी हैं. रॉबर्ट पैटिनसन वर एंटिनस के रूप में हमेशा की तरह खूबसूरत तरीके से उदास हैं. जॉन लेगुइजामो वफादार सूअर चराने वाले यूमेयस के रूप में थोड़ी देर के लिए आते हैं. इनमें से आधे किरदार किसी शानदार नए अभिनेता से भी कराए जा सकते थे, जिसकी फीस इन सितारों की दस प्रतिशत होती, और शायद किसी को फर्क भी नहीं पड़ता. इतने सारे शानदार कलाकार इसलिए नहीं जुटाए जाते कि उन्हें बेहतरीन सिनेमैटोग्राफी और शानदार बैकग्राउंड स्कोर के बीच एक्स्ट्रा कलाकार जैसा काम दिया जाए.
और यह एक-आयामीपन सिर्फ उन किरदारों तक सीमित नहीं है जिन्हें कम समय मिला है. यह उन किरदारों में भी है जिन्हें स्क्रीन टाइम मिला है. ‘ओडिसी’ का लगभग हर किरदार एक ही भावना लेकर आता है और उसी भावना के साथ चला जाता है. ओडेसियस उदास है. उदास रहता है. और जब कुछ समझ न आए तो थोड़ा और उदास हो जाता है. एथेना सख्त है. टेलीमेकस नाराज है. पेनिलोपी इंतजार करती है. होमर की महानता यह थी कि उन्होंने इन सभी किरदारों को दूसरा गियर दिया था.
एथेना का स्नेह धीरे-धीरे अधीरता में बदलता है. पेनिलोपी का धैर्य धीरे-धीरे अपने पति जितनी ही चालाकी में बदल जाता है. पति पहले मजेदार लगते हैं, फिर घटिया. नोलन में ये सब कभी-कभी झलकते जरूर हैं. कैमरा इधर घूमता है, उधर घूमता है और अचानक कोई मानवीय पल दिख जाता है. लेकिन फिर गायब. नोलन ने हर किरदार को एक विशेषण में समेट दिया है और इस सपाटपन को गंभीरता का नाम दे दिया है. यह गंभीरता नहीं है. यह ह्यूब्रिस है- अपनी महानता पर इतना भरोसा कि सपाटपन भी आपको गहराई लगने लगे.
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