'पैसा हमारा, फेवर ईरान का ले रहे थे...', जंग में 'चौधरी' बन फिर मझधार में फंसा पाकिस्तान
'पैसा हमारा, फेवर ईरान का ले रहे थे...', जंग में 'चौधरी' बन फिर मझधार में फंसा पाकिस्तान

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर बड़े हमले की योजना रोककर तेहरान के साथ फिर से कूटनीतिक बातचीत का रास्ता खोला, तो इसी के बाद पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल उठ गए. रिटायर्ड अमेरिकी जनरल और रक्षा विश्लेषक जैक कीन ने कहा कि ईरान के साथ तनाव कम करने की कोशिशों में मध्यस्थ बने पाकिस्तान और कतर समझौता कर चुके पक्ष हैं. वे वॉशिंगटन के बजाय तेहरान के पक्ष में झुके हुए हैं.
फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में कीन ने कहा कि ऐसे मध्यस्थों के चुने जाने से ईरान को लेकर अमेरिकी कूटनीति पर खराब असर पड़ा. उनका कहना था कि यह बात मध्य पूर्व में खुफिया एजेंसियों और क्षेत्र के खिलाड़ियों को अच्छी तरह पता है कि पाकिस्तान और कतर अमेरिका की कीमत पर ईरान का फेवर लेते हैं, और यह कोई नई बात नहीं बल्कि पुराना रुख है.
यह भी पढ़ें: यूक्रेन से भिड़ने वाला था ईरान! 3 ठिकानों पर हमले का प्लान, 'माफी' ने टाल दी जंग
जैक कीन ने कहा कि पाकिस्तान और कतरी मध्यस्थों के असर ने अमेरिका को ईरान की असली मंशा समझने में गुमराह करने का काम किया. उन्होंने कहा कि दोनों देशों का झुकाव ऐतिहासिक तौर पर ईरान की तरफ रहा है, लेकिन फिर भी वही मध्यस्थ की भूमिका में दिखाई दिए. कीन फिलहाल इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ वॉर के चेयरमैन हैं. वह सेक्रेटरी ऑफ डिफेंस पॉलिसी बोर्ड के सदस्य भी हैं, 4 अमेरिकी रक्षा मंत्रियों को सलाह दे चुके हैं और 2018 और 2022 की कॉन्ग्रेशनल कमीशन ऑन द नेशनल डिफेंस स्ट्रैटेजी का भी हिस्सा रहे हैं.
कीन ने सऊदी अरब की भूमिका पर भी सवाल उठाए. उन्होंने आरोप लगाया कि रियाद ने कई बार वॉशिंगटन को ईरान के खिलाफ सख्त सैन्य कार्रवाई से रोका. होर्मुज स्ट्रेट से जुड़ी चर्चाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने दावा किया कि सऊदी अरब ने अमेरिका को अपने एयरबेस और हवाई क्षेत्र के इस्तेमाल की इजाजत नहीं दी. उन्होंने यह सलाह दी कि सैन्य कार्रवाई नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ऐसा ऑपरेशन सफल नहीं होगा. कीन के मुताबिक, सऊदी अरब बार-बार बातचीत का रास्ता अपनाने की सलाह देता रहा.
यह भी पढ़ें: ईरान की चेतावनी, होर्मुज में दूसरा पासेज बना तो अमेरिकी युद्धपोत पर बरसेंगी मिसाइलें
कीन ने यह भी कहा कि सऊदी अरब ईरान की आक्रामकता खत्म करने के लिए खुद कोई कीमत चुकाने को तैयार नहीं दिखता. उनके मुताबिक, रियाद न तो जानमाल के नुकसान का जोखिम लेना चाहता है और न अपने तेल ढांचे को नुकसान पहुंचाने का, जबकि वह चाहता है कि यह बोझ अमेरिका और इजरायल उठाएं. उन्होंने खाड़ी युद्ध के दौरान सऊदी अरब की सुरक्षा में अमेरिका की भूमिका और जमाल खाशोगी की हत्या के बाद भी दोनों देशों के रणनीतिक रिश्तों का जिक्र करते हुए इस रुख को शर्मनाक बताया.
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें