'सलवार उतारना रेप की कोशिश नहीं...', पटना हाई कोर्ट के फैसले को SC ने बताया आपत्तिजनक, नोटिस जारी
'सलवार उतारना रेप की कोशिश नहीं...', पटना हाई कोर्ट के फैसले को SC ने बताया आपत्तिजनक, नोटिस जारी

- पटना HC ने कपड़े उतारने और छेड़छाड़ को रेप की कोशिश नहीं मानते हुए आरोपी को बरी किया था.
- CJI सूर्यकांत, जस्टिस बागची और जस्टिस मोहना की बेंच ने फैसले को सुओ मोटो पिटीशन के रूप में दर्ज किया.
- SC ने बिहार सरकार को स्थानीय पुलिस के जरिए आरोपी को नोटिस तामील कराने का निर्देश दिया.
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को पटना हाई कोर्ट के उस फैसले पर स्वतः संज्ञान लिया, जिसमें रेप की कोशिश के एक दोषी को बरी कर दिया गया था. बरी करते हुए हाई कोर्ट ने कहा था कि पीड़िता और खुद के कपड़े उतारना और उसके साथ शारीरिक छेड़छाड़ करना रेप की कोशिश नहीं है. कोर्ट ने कहा था कि ऐसा करने पर आईपीसी की धारा 354 के तहत महिला की गरिमा भंग करने का अपराध बनता है. भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच ने स्वतः संज्ञान लेते हुए नोटिस जारी किया. बेंच ने संकेत दिया कि वह पटना हाई कोर्ट के फैसले में की गई विवादित टिप्पणियों की जांच करेगी.
बेंच ने कहा कि आरोपी को सुनने के बाद ही सुप्रीम कोर्ट इन टिप्पणियों को हटा सकता है. कोर्ट ने बिहार सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि स्थानीय पुलिस के जरिए संबंधित आरोपी को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस दिया जाए.
मामले को सुओ मोटो रिट पिटीशन (क्रिमिनल) नंबर 5 ऑफ 2026 के रूप में दर्ज किया गया है. यह मामला सीजेआई के निर्देश पर दर्ज किया गया. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले से जुड़े स्वतः संज्ञान मामले में रेप की तैयारी और रेप की कोशिश के बीच अंतर को लेकर फैसला दिया था.
क्या है पूरा मामला?
पटना हाई कोर्ट का यह फैसला हिमांशु कुमार पाठक उर्फ मिथिया पाठक की अपील पर आया था. निचली अदालत ने उसे बिहार के बांका जिले के अमरपुर पुलिस थाने में 2008 में दर्ज एक मामले में आईपीसी की धारा 376/511 और 342 के तहत दोषी ठहराया था.
अभियोजन पक्ष के मुताबिक, पीड़िता 19 जनवरी 2008 को अपने पिता के साथ अमरपुर स्थित आरोपी के फोटोग्राफी स्टूडियो गई थी. उसकी तस्वीर लेने के बाद आरोपी ने कथित तौर पर उसके पिता को कंप्यूटर पर तस्वीर देखने के लिए कहा और स्टूडियो का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया.
पीड़िता ने आरोप लगाया कि आरोपी ने दुष्कर्म के इरादे से उसके कपड़े उतारने की कोशिश की, अपने कपड़े उतारे और उसके साथ शारीरिक छेड़छाड़ की. पीड़िता के शोर मचाने पर उसके पिता दरवाजे के पास पहुंचे. इसके बाद आरोपी ने दरवाजा खोला और स्टूडियो से भाग गया.
निचली अदालत ने बाद में आरोपी को दोषी ठहराते हुए आईपीसी की धारा 376/511 के तहत तीन साल की जेल और धारा 342 के तहत छह महीने की जेल की सजा सुनाई थी. दोनों सजाएं एक साथ चलनी थीं.
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हाई कोर्ट ने क्या फैसला दिया था?
पटना हाई कोर्ट ने 9 जुलाई को दिए अपने फैसले में सबूतों का दोबारा मूल्यांकन किया और कहा कि अभियोजन पक्ष दुष्कर्म की कोशिश के लिए जरूरी तथ्यों को साबित करने में नाकाम रहा.
जस्टिस पूर्णेंदु सिंह की सिंगल बेंच ने कहा था कि पेनिट्रेशन का कोई सबूत नहीं था और अभियोजन पक्ष ने रेप की कोशिश के आरोप के समर्थन में कोई मेडिकल सबूत भी पेश नहीं किया.
हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि मामले की जांच पूरी कर चार्जशीट दाखिल करने वाले जांच अधिकारी से मुकदमे के दौरान पूछताछ नहीं की गई थी. कोर्ट ने कहा कि आरोपी ने पीड़िता को स्टूडियो के अंदर रोका, दरवाजा बंद किया, उसके कपड़े उतारने की कोशिश की और उसके साथ शारीरिक छेड़छाड़ की.
इसके बाद हाई कोर्ट ने नतीजा निकाला कि सभी आरोपों को पूरी तरह सही मान लेने पर भी वे साफ तौर पर आईपीसी की धारा 376 के साथ धारा 511 के तहत रेप की कोशिश का अपराध साबित नहीं करते. हाई कोर्ट के मुताबिक, यह मामला आईपीसी की धारा 354 के दायरे में आता है, जो महिला की गरिमा भंग करने के इरादे से उस पर हमला करने या आपराधिक बल का इस्तेमाल करने से संबंधित है.
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इसके बाद पटना हाई कोर्ट ने निचली अदालत के दोषसिद्धि और सजा के फैसले को रद्द करते हुए अपीलकर्ता को सभी आरोपों से बरी कर दिया. हाई कोर्ट ने आरोपी की तरफ से जमा किए गए किसी भी जुर्माने को वापस करने का भी निर्देश दिया.
ताजा कार्यवाही से पहले 14 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने रेप की कोशिश से जुड़े एक अन्य स्वतः संज्ञान मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर फैसला दिया था. उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया था, जिसमें कहा गया था कि एक नाबालिग के खिलाफ आरोप प्रथम दृष्टया दुष्कर्म की कोशिश का मामला नहीं बनाते.
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