क्या है PDO, जिसने अल-नीनो को दबाकर गुजरात में तगड़ी बारिश कराई

खेल

क्या है PDO, जिसने अल-नीनो को दबाकर गुजरात में तगड़ी बारिश कराई

24 जुलाई 2026 को 09:59 am बजे
क्या है PDO, जिसने अल-नीनो को दबाकर गुजरात में तगड़ी बारिश कराई

गुजरात में इन दिनों मॉनसून ने अपना विकराल रूप दिखाया है. सामान्य बारिश नहीं, बल्कि कहर ढाने वाली तबाही दिख रही है. मात्र 14 घंटों में कई इलाकों में 400 मिमी से ज्यादा पानी बरसा है. चिखली (नवसारी) में 451 मिमी, ढोलका (अहमदाबाद) में 440 मिमी, खेरगाम में 431 मिमी, उमरपाडा (सूरत) में 405 मिमी और उमरगांव (वलसाड) में 365 मिमी बारिश दर्ज की गई.

नदियां उफान पर हैं. सड़कें जलमग्न हो गई हैं. खेत डूब गए हैं. आम जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है. यह बारिश सामान्य मॉनसून से कहीं ज्यादा तीव्र और विनाशकारी साबित हो रही है. इस तबाही के बीच मौसम वैज्ञानिकों और सोशल मीडिया पर एक बहस छिड़ गई है. कई महीनों पहले अल-नीनो का इतना हौवा बनाया गया कि लोग सूखे की आशंका से डर गए थे.

यह भी पढ़ें: सैटेलाइट तस्वीरों में कैद हुआ बारिश का पूरा 'रूट मैप', जानिए क्या दिखा

देशी फोरकास्टर से लेकर अमेरिकी वैज्ञानिकों तक ने मॉडल रन करके सूखा पड़ने की भविष्यवाणी की थी. लेकिन हकीकत उलटी निकली. मॉनसून ने न सिर्फ सामान्य बल्कि अत्यधिक बारिश दी. सवाल उठता है कि आखिर वैज्ञानिकों ने पैसिफिक डिकेडल ऑसीलेशन यानी PDO को क्यों अंडरएस्टीमेट किया?

पैसिफिक डिकेडल ऑसीलेशन (PDO) प्रशांत महासागर में समुद्र की सतही तापमान में होने वाले लंबे समय के बदलाव का पैटर्न है. यह दशकीय यानी 20-30 साल के चक्र में चलता है. यह अल-नीनो और ला-नीना (ENSO) जैसा ही है लेकिन इसका टाइम पीरियड बहुत लंबा होता है. ENSO कुछ महीनों से लेकर दो साल तक चलता है, जबकि PDO दशकों तक अपना असर बनाए रखता है.

PDO के दो मुख्य फेज होते हैं - पॉजिटिव और नेगेटिव. पॉजिटिव फेज में उत्तर-पूर्वी प्रशांत महासागर के तट के पास पानी गर्म होता है और मध्य-उत्तर प्रशांत ठंडा. नेगेटिव फेज में ठीक उलटा पैटर्न दिखता है - उत्तर-पूर्वी तट ठंडा और मध्य भाग अपेक्षाकृत गर्म. वर्तमान में 2026 में PDO बहुत मजबूत नेगेटिव फेज में है, जिसके इंडेक्स वैल्यू -1.3 से -1.6 के आसपास दर्ज की गई हैं.

यह भी पढ़ें: पूरे देश में मॉनसूनी बादल, बारिश भी हो रही... लेकिन दिल्ली क्यों सूखी?

यह ऑसीलेशन सिर्फ समुद्र की तापमान नहीं बदलता, बल्कि हवा के दबाव, हवाओं की दिशा और पूरी ग्लोबल वातावरणीय सर्कुलेशन को प्रभावित करता है. भारत के मॉनसून के साथ इसका गहरा संबंध है.

साइंटिफिक स्टडीज से पता चलता है कि नेगेटिव PDO फेज भारतीय ग्रीष्मकालीन मॉनसून को मजबूत बनाता है. इसमें भारत के ऊपर नमी भरी हवाओं का फ्लो बेहतर होता है. पश्चिमी प्रशांत और भारतीय महासागर से नमी खींचकर मॉनसून ट्रफ मजबूत होती है. नतीजा - सामान्य से ज्यादा और कुछ इलाकों में अत्यधिक भारी बारिश.

इसके ठीक उलट पॉजिटिव PDO अक्सर भारत में कमजोर मॉनसून और सूखे की स्थिति पैदा करता है. पिछले कुछ दशकों के रिकॉर्ड देखें तो नेगेटिव PDO पीरियड्स में भारत में एक्सेस रेनफॉल देखा गया है. गुजरात जैसे पश्चिमी भारत के हिस्सों में यह प्रभाव और भी मजबूत होता है क्योंकि यहां अरब सागर से आने वाली नमी PDO पैटर्न से सीधे प्रभावित होती है.

इस साल वैज्ञानिकों ने मुख्य रूप से ENSO यानी अल-नीनो पर फोकस किया. अल-नीनो के कमजोर होते जाने और ला-नीना की आशंका के बावजूद कई मॉडल्स ने रेनफॉल डेफिसिट दिखाया. लेकिन PDO का नेगेटिव फेज इतना स्ट्रॉन्ग था कि उसने ENSO के प्रभाव को ओवरराइड कर दिया. यही कारण है कि कई फोरकास्ट गलत साबित हुए.

यह भी पढ़ें: "B-1, B-2 और B-52 बरसा रहे ईरान पर बम, बेबस हुआ एयर डिफेंस

PDO को अंडरएस्टीमेट करने के कई कारण हैं. सबसे बड़ा कारण यह है कि PDO दशकीय चक्र है, जबकि मौसम पूर्वानुमान मुख्य रूप से सीजनल स्केल पर फोकस करते हैं. ENSO जैसे शॉर्ट-टर्म ड्राइवर्स आसानी से मॉडल्स में कैप्चर हो जाते हैं, लेकिन PDO जैसे लॉन्ग-टर्म ड्राइवर्स को पूरी तरह समझना और मॉडल में शामिल करना चुनौतीपूर्ण है.

दूसरा, कई मॉडल्स में PDO की वैरिएबिलिटी को अंडरएस्टिमेट किया जाता है. क्लाइमेट मॉडल्स अब भी डिकेडल वैरिएबिलिटी को परफेक्टली सिमुलेट नहीं कर पाते. नतीजतन, फोरकास्टर्स ने PDO की ताकत को कम आंका.

तीसरा कारण क्लाइमेट चेंज का ओवरलैप है. ग्लोबल वार्मिंग के कारण समुद्र के तापमान बढ़ रहे हैं, जिससे PDO पैटर्न में कुछ बदलाव दिख रहे हैं. कुछ अध्ययनों में कहा गया है कि वार्मिंग PDO के नेगेटिव फेज को और इंटेंस बना सकती है, लेकिन मॉडल्स इस इंटरैक्शन को पूरी तरह नहीं समझ पाए.

गुजरात में हुई भारी बारिश एक सिंगल सिस्टम का नतीजा नहीं बल्कि बड़े क्लाइमेट पैटर्न का हिस्सा है. नेगेटिव PDO ने मॉनसून ट्रफ को दक्षिण की ओर शिफ्ट होने में मदद की. अरब सागर से लगातार नमी आ रही है. लोकल फैक्टर्स जैसे टोपोग्राफी और शहरी बाढ़ ने स्थिति को और बिगाड़ा.

चिखली, उमरगांव जैसे इलाके भौगोलिक रूप से ऐसे हैं जहां पहाड़ी इलाके और समुद्र की निकटता भारी बारिश को बढ़ावा देती है. 400 मिमी से ज्यादा बारिश 24 घंटे में सामान्य नहीं है - यह एक्सट्रीम इवेंट है जो क्लाइमेट चेंज के युग में ज्यादा आम हो रहा है.

यह भी पढ़ें: फ्रांस में गर्मी बनी साइलेंट किलर, 16 दिनों में 20 हजार से ज्यादा मौतें

यह घटना हमें याद दिलाती है कि मौसम पूर्वानुमान में सिर्फ ENSO नहीं देखना चाहिए. PDO, Indian Ocean Dipole (IOD), Atlantic Multidecadal Oscillation (AMO) जैसे दूसरे ड्राइवर्स को भी बराबर महत्व देना जरूरी है. मल्टी-डिकेडल फोरकास्टिंग सिस्टम को मजबूत करने की जरूरत है.

किसानों, प्रशासन और आम लोगों को भी इन बड़े पैटर्न की जानकारी होनी चाहिए. अगर PDO नेगेटिव फेज में रहेगा तो अगले कुछ सालों में भारत के कई हिस्सों में भारी बारिश और फ्लड की संभावना बनी रहेगी. साथ ही, क्लाइमेट चेंज के कारण एक्सट्रीम इवेंट्स की तीव्रता बढ़ रही है. गुजरात की इस तबाही ने एक बार फिर साबित कर दिया कि प्रकृति को सिर्फ एक कोण से नहीं देखा जा सकता.

शेयर करें
हिंदी खबर नेटवर्क पर पढ़ें ताज़ा हिंदी समाचार।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Hyderabad News: 58 हजार करोड़ से बदलेगी मूसी नदी की सूरत, लंदन की टेम्स की तर्ज पर बनेगा रिवरफ्रंट

बॉक्स ऑफिस कलेक्शन: पहले दिन 100 करोड़ पार 'टॉक्सिक', शाहरुख और रणवीर सिंह की इन फिल्मों का तोड़ डाला रिकॉर्ड

Toxic Box Office Collection Day 1: यश की टॉक्सिक ने पहले दिन कमाए 140 करोड़, जवान और एनिमल को छोड़ा पीछे