कंगना-रामदेव विवाद, क्या राइट विंग में बढ़ती बेचैनी का संकेत है?

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कंगना-रामदेव विवाद, क्या राइट विंग में बढ़ती बेचैनी का संकेत है?

20 अगस्त 2026 को 06:32 am बजे
कंगना-रामदेव विवाद, क्या राइट विंग में बढ़ती बेचैनी का संकेत है?

राजनीति में कई बार घटनाएं अपने तत्काल कारणों से अधिक महत्वपूर्ण उन संकेतों के कारण हो जाती हैं जो वे भविष्य के लिए छोड़ जाती हैं. भाजपा सांसद और अभिनेत्री कंगना रनौत तथा योगगुरु बाबा रामदेव के बीच छिड़ा ताजा विवाद भी कुछ ऐसा ही है. शुरुआत जेन-जी को लेकर कंगना की विवादित टिप्पणी से हुई. बाबा रामदेव ने उस बयान को बिगड़े दिमाग की निशानी बताया और कंगना के बचपन और जवानी तक पहुंच गए. यहां तक कहा कि उनकी पार्टी को भी इस पर ध्यान देना चाहिए. जवाब में कंगना ने भी बेहद तीखी भाषा का इस्तेमाल करते हुए रामदेव को अपने "बेडरूम और जवानी के सपने न देखने" की सलाह दे डाली. विवाद देखते ही देखते व्यक्तिगत हमलों में बदल गया.

पिछले एक दशक में भाजपा और राइट विंग  परिवार ने केवल चुनावी सफलता ही हासिल नहीं की, बल्कि उसने एक बड़ा सामाजिक-सांस्कृतिक गठबंधन भी तैयार किया है. इसमें संत, योगगुरु, उद्योगपति, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर, फिल्मी हस्तियां और अनेक वैचारिक समूह शामिल रहे हैं. बाबा रामदेव और कंगना रनौत दोनों इस इकोसिस्टम के प्रमुख प्रतीक रहे हैं. ऐसे में जब दोनों सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे पर हमला करते हैं तो,जाहिर  है कि उसका असर केवल उनकी व्यक्तिगत छवि तक सीमित नहीं रहता.

कंगना रनौत और बाबा रामदेव के बीच छिड़ा विवाद केवल दो व्यक्तियों की जुबानी जंग नहीं है. यह राइट विंग के बड़े परिवार के अंदर की दरार का विद्रूप प्रदर्शन है. हालांकि दोनों ही अपने बड़बोलेपन के चलते अकसर केंद्रीय सत्ता से दूर ही नजर आते हैं. पर दोनों ही लंबे समय से हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रतीक माने जाते रहे हैं. कंगना भाजपा सांसद हैं और पार्टी की आक्रामक आवाज हैं. रामदेव योग और आयुर्वेद के जरिए करोड़ों लोगों तक पहुंच रखते हैं तथा परंपरागत रूप से सत्ताधारी दल के करीबी माने जाते हैं. ऐसे में जब ये दोनो एक-दूसरे पर व्यक्तिगत हमले हो रहे हों ,एक तरफ जवानी और चरित्र पर टिप्पणी, दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट की फटकार और धोखाधड़ी का जिक्र हो तो दोनों की थू-थू होना तय है. यह लड़ाई राइट विंग की छवि को नुकसान नहीं बल्कि घायल कर रही है.

यहां एक राजनीतिक प्रश्न उठता है. क्या बाबा रामदेव का कंगना पर हमला वास्तव में केवल जेन-जी के पक्ष में दिया गया बयान था या इसके पीछे एक व्यापक संदेश भी छिपा था? जिस तरह उन्होंने कंगना के बयान की आलोचना करते हुए उनकी पार्टी को भी नसीहत दी, उससे यह साफ संकेत गया कि वह केवल एक सामाजिक टिप्पणी नहीं कर रहे थे, बल्कि राजनीतिक संदेश भी दे रहे थे.

यही कारण है कि कुछ विश्लेषक इसे सत्तारूढ़ दल की घटती पकड़ या बढ़ती अलोकप्रियता के संकेत के रूप में देख रहे हैं. उनका तर्क है कि जब सत्ता अपने चरम पर होती है तो उससे निकटता रखने वाले प्रभावशाली लोग सार्वजनिक रूप से टकराने से बचते हैं. लेकिन जैसे-जैसे राजनीतिक शक्ति का आकर्षण कम होता है, वैसे-वैसे सहयोगी समूह अपनी स्वतंत्र पहचान स्थापित करने लगते हैं. तब वे सत्ता से दूरी बनाने या उसे चुनौती देने में भी हिचकिचाते नहीं.

हालांकि इस निष्कर्ष पर पहुंचने में सावधानी बरतनी होगी. भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि बड़ी और प्रभावशाली पार्टियों में आंतरिक मतभेद हमेशा मौजूद रहते हैं. कांग्रेस के सबसे मजबूत दौर में भी उसके भीतर अनेक शक्ति केंद्र थे. समाजवादी राजनीति तो लगभग गुटबाजी का पर्याय रही है. भाजपा आज देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है. उसके साथ जुड़े लोगों के विचार, महत्वाकांक्षाएं और प्राथमिकताएं भी अलग-अलग हैं. ऐसे में समय-समय पर सार्वजनिक मतभेद सामने आना अस्वाभाविक नहीं है.

लेकिन यह भी उतना ही सच है कि इस विवाद ने राइट विंग की उस नैतिक बढ़त को नुकसान पहुंचाया है, जिसका दावा उसके समर्थक अक्सर करते हैं. एक पक्ष दूसरे के चरित्र पर सवाल उठाए और दूसरा जवाब में व्यक्तिगत टिप्पणियां करे, तो इससे किसी विचारधारा की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ती. सोशल मीडिया पर दोनों के समर्थक जिस तरह एक-दूसरे पर टूट पड़े, उसने विरोधियों को यह कहने का मौका दे दिया कि राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक मूल्यों की बात करने वाले लोग भी अंततः उसी राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा बन जाते हैं जिसकी वे आलोचना करते हैं.

क्या यह सत्तारूढ़ पार्टी की बढ़ती अलोकप्रियता का प्रमाण है? पूरी तरह नहीं कहा जा सकता पर कुछ तो ऐसा हो रहा है. भाजपा अभी भी संगठनात्मक रूप से मजबूत है और चुनावी मशीनरी सक्रिय है. लेकिन ऐसे विवाद बताते हैं कि पार्टी और उसके वैचारिक साथियों के बीच तालमेल में कमी आ रही है. जब सत्ता लंबे समय तक चलती है तो अहंकार, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और असंतोष उभरने लगते हैं. रामदेव का रुख युवा आक्रोश को भुनाने या अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने का प्रयास भी हो सकता है. कंगना की बेबाकी उनकी शैली है, लेकिन सत्ता पक्ष की सांसद होने के नाते संयम अपेक्षित था.

सच्ची बात यह है कि राइट विंग को समझ लेना चाहिए कि उनकी एकजुटता खतरे में है. आंतरिक कलह से न तो योग की छवि बचती है, न राजनीति की. जनता चरित्र की बात सुनना चाहती है, न कि एक-दूसरे के बेडरूम के सपने. अगर बाबा जैसी शख्सियतें सरकार को आंख दिखाने लगें तो आने वाले दिनों में और आवाजें उठ सकती हैं. यह अलोकप्रियता का संकेत हो सकता है, या फिर सत्ता के लंबे शासन का स्वाभाविक दुष्परिणाम. दोनों ही स्थितियों में राइट विंग को सबक लेना होगा कि सार्वजनिक मंच पर मर्यादा बनाए रखें, नहीं तो थू-थू का सिलसिला जारी रहेगा और वैचारिक पूंजी क्षीण होती जाएगी.

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