भारत-पाक सीमा पर अब आसमान से आने वाले खतरे का जवाब देगा BSF

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भारत-पाक सीमा पर अब आसमान से आने वाले खतरे का जवाब देगा BSF

19 अगस्त 2026 को 08:38 am बजे
भारत-पाक सीमा पर अब आसमान से आने वाले खतरे का जवाब देगा BSF

भारत-पाकिस्तान सीमा पर सुरक्षा की तस्वीर पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदल गई है. पहले मुख्य चुनौती जमीन से घुसपैठ, सुरंगों के जरिए हथियार और नशीले पदार्थों की तस्करी थी. अब छोटे आकार के ड्रोन कम ऊंचाई पर उड़कर सीमा पार से सामान पहुंचा रहे हैं. ये ड्रोन संचालक को सीमा पार किए बिना भारतीय क्षेत्र में हथियार, गोला-बारूद या ड्रग्स पहुंचाने का आसान रास्ता देते हैं.

पंजाब, जम्मू और राजस्थान से जुड़े इलाकों में ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं. इसी बदलाव को देखते हुए सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है. अब जवान सिर्फ जमीन पर गश्त करने वाले नहीं रह गए हैं, बल्कि उन्हें आसमान की निगरानी और ड्रोन खतरे का जवाब देने के लिए भी तैयार किया जा रहा है. यह बदलाव इसलिए जरूरी हो गया क्योंकि आधुनिक सीमा सुरक्षा में ड्रोन सिर्फ निगरानी का साधन नहीं रह गए हैं. वे खुफिया जानकारी जुटाने, हथियार पहुंचाने और हमले करने का जरिया भी बन चुके हैं.

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भारत-पाक सीमा हजारों किलोमीटर लंबी है. हर जगह स्थायी और भारी एंटी-ड्रोन सिस्टम लगाना व्यावहारिक रूप से मुश्किल है. इसलिए बीएसएफ मोबाइल एंटी-ड्रोन शील्ड पर जोर दे रही है. यह सिस्टम किसी एक जगह पर बांधकर नहीं रखा जाता. जब किसी क्षेत्र में ड्रोन गतिविधि बढ़ती है या संवेदनशील ठिकाना खतरे में आता है, तो इसे तेजी से वहां पहुंचाया जा सकता है.

सीमा चौकियां, हथियार गोदाम, आबादी वाले इलाके या ऑपरेशनल जोन को जरूरत के हिसाब से अतिरिक्त सुरक्षा दी जा सकती है. काउंटर-ड्रोन सिस्टम में आमतौर पर ड्रोन की पहचान, सिग्नल ट्रैक करने, उसे जाम करने और निष्क्रिय करने की क्षमता होती है.

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बीएसएफ जवानों को डिटेक्टर, जैमर तथा सॉफ्ट-किल और हार्ड-किल दोनों विकल्पों की ट्रेनिंग दे रही है. सॉफ्ट-किल में ड्रोन के संचार या नेविगेशन सिस्टम को इलेक्ट्रॉनिक तरीके से बाधित किया जाता है, जबकि हार्ड-किल में ड्रोन को भौतिक रूप से गिराया या नष्ट किया जाता है. दोनों तरीकों का संयोजन सीमा पर किसी भी तरह के यूएवी खतरे का तुरंत जवाब देने में मदद करता है.

ड्रोन खतरे को गंभीरता से लेते हुए बीएसएफ ने मध्य प्रदेश के टेकनपुर स्थित अपनी अकादमी में स्कूल ऑफ ड्रोन वॉरफेयर स्थापित किया है. यहां ड्रोन कमांडो और ड्रोन वॉरियर जैसे कोर्स चलाए जा रहे हैं. जवानों को व्यावहारिक रूप से ड्रोन उड़ाना, रखरखाव, तकनीकी जानकारी और ऑपरेशनल इस्तेमाल सिखाया जाता है. अधिकारियों को रणनीतिक और कमांड स्तर की ट्रेनिंग दी जाती है.

प्रशिक्षण को तीन मुख्य हिस्सों में बांटा गया है- फ्लाइंग एंड पायलटिंग, टैक्टिक्स तथा रिसर्च एंड डेवलपमेंट. इससे बीएसएफ सिर्फ ऑपरेटर नहीं, बल्कि ऐसे विशेषज्ञ तैयार कर रही है जो ड्रोन के इस्तेमाल और उससे निपटने की पूरी रणनीति समझ सकें. ट्रेनिंग में वास्तविक फील्ड परिस्थितियों को भी शामिल किया गया है.

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अलग-अलग मौसम, हवा, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक इंटरफेरेंस और सीमावर्ती इलाकों की भौगोलिक चुनौतियों में ड्रोन संचालन सिखाया जाता है. इससे जवान सीमा पर बेहतर फैसला ले पाते हैं.

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ड्रोन के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल ने सुरक्षा एजेंसियों को एक साफ संदेश दिया- भविष्य की लड़ाई सिर्फ जमीन पर नहीं लड़ी जाएगी. रूस-यूक्रेन युद्ध ने भी दिखाया है कि कम लागत वाले ड्रोन युद्ध के मैदान में कितना बड़ा असर डाल सकते हैं. भारत की पश्चिमी सीमा पर चुनौती और गंभीर है क्योंकि यहां ड्रोन का इस्तेमाल सिर्फ सैन्य खतरे तक सीमित नहीं.

हथियार, गोला-बारूद और नशीले पदार्थों की तस्करी के लिए भी इन्हें इस्तेमाल किया जा रहा है. इसलिए BSF को एक साथ सीमा सुरक्षा, नारकोटिक्स विरोधी अभियान और आतंकवाद रोधी रणनीति के तहत काम करना पड़ता है. इसी अनुभव के बाद बीएसएफ ने ड्रोन ट्रेनिंग और काउंटर-ड्रोन क्षमताओं को और तेज कर दिया है.

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ड्रोन को रोकना या गिराना समस्या का सिर्फ एक हिस्सा है. उसके पीछे का पूरा नेटवर्क समझना ज्यादा महत्वपूर्ण है. बरामद ड्रोन का फॉरेंसिक विश्लेषण यह बता सकता है कि वह कहां से आया, किसने उड़ाया और सामग्री किसने हासिल की. BSF ने दिल्ली और अमृतसर में ड्रोन फॉरेंसिक लैब स्थापित करने की दिशा में काम किया है.

अब सीमा पर ड्रोन के खिलाफ लड़ाई सिर्फ देखो और गिराओ तक सीमित नहीं रह गई. यह डिटेक्शन, ट्रैकिंग, न्यूट्रलाइजेशन और फॉरेंसिक इंटेलिजेंस की पूरी श्रृंखला बन चुकी है. केंद्र सरकार भी इस दिशा में सक्रिय है. मई 2026 में राजस्थान के बीकानेर में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि अंतरराष्ट्रीय सीमा पर अगले छह महीनों में एंटी-ड्रोन सिस्टम लगाए जाएंगे. उन्होंने ड्रोन से पहुंचाई गई सामग्री हासिल करने वालों की पहचान पर भी जोर दिया.

आने वाले समय में भारत-पाकिस्तान सीमा पर जमीन की बाड़, कैमरे और गश्त के साथ-साथ आसमान में ड्रोन और एंटी-ड्रोन सिस्टम की भूमिका और बढ़ेगी. सेंसर, रडार, थर्मल इमेजर, फाइबर-ऑप्टिक सेंसर, एआई आधारित पहचान और रियल-टाइम निगरानी सीमा प्रबंधन को ज्यादा डेटा आधारित बनाएंगी.

इससे जवानों की शारीरिक गश्त का दबाव भी कम हो सकता है. संदिग्ध गतिविधियों पर तेजी से प्रतिक्रिया संभव होगी. लेकिन तकनीक के बावजूद मानव कौशल की भूमिका खत्म नहीं होगी. संदिग्ध गतिविधि की सही पहचान, उसकी मंशा समझना और सही समय पर जवाब देना अभी भी प्रशिक्षित जवान और कमांडर पर निर्भर करेगा.

बीएसएफ का मोबाइल एंटी-ड्रोन शील्ड इसी बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा है, जिसमें जमीन, आसमान, इलेक्ट्रॉनिक निगरानी और इंटेलिजेंस एक-दूसरे से जुड़े हैं. अब सीमा सुरक्षा की लड़ाई सिर्फ तारबंदी के इस पार और उस पार नहीं है. नई चुनौती आसमान से आ रही है. बीएसएफ उसी ऊंचाई पर जवाब तैयार कर रहा है.

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